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Shri Krishna Janmashtami 2022 | जन्माष्टमी दिन तारीख पूजा विधि व मुहूर्त

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Shri Krishna Janmashtami - 2022
श्री कृष्ण जन्माष्टमी का महत्व - 2022

 आपको अपने दुखों, चिंताओं व हालातों से लड़ने की सीख, श्री कृष्ण से बेहतर कोई नहीं दे सकता है। जब आप श्री कृष्ण के जीवन को करीब से देखेंगे। तो आपको उसमें अपने जीवन का user manual दिखाई देगा। जिसमें आपके जीवन की हर परेशानी का हल है। इसलिए आप भी श्रीकृष्ण को, अपने जीवन का user manual बनाइए।

      श्री कृष्ण के जीवन में, उनका सब कुछ छूट गया। फिर भी वह विचलित नहीं हुए। पहले उनकी मां छूटी। उनके पिता छूटे। फिर जिन नंदबाबा और यशोदा ने उन्हें पाल-पोश कर बड़ा किया। वह भी छूट गए। जिन दोस्तों के साथ खेलते-कूदते बढ़े हुए। फिर वह छूटे। उनका प्रेम राधा भी, उनके साथ हमेशा नहीं रही।

      इसके अलावा पहले, वह गोकुल से दूर हुए। फिर मथुरा से दूर हुए। आखिर में उन्हीं के द्वारा बसाया गया नगर, द्वारका भी समुद्र में जल-मग्न हो गया। लेकिन अगर कुछ नहीं छुटा। तो वह उनकी मुस्कान और उनकी सकारात्मकता थी। इसीलिए श्री कृष्ण दुख के नहीं, बल्कि उत्सव के प्रति प्रतीक हैं। श्रीकृष्ण अकेले हैं। जिनका जन्म रोते हुए नहीं, बल्कि हंसते हुए हुआ था।

      वह पूरे जीवन मुस्कुराते रहे। यह अलग बात है कि उनका पूरा जीवन युद्ध में बीता। संघर्षों में बीता। चुनौतियों के बीच बीता। उन्होंने भी शायद सुख का एक दिन भी नहीं  देखा होगा। कुछ लोगों के जीवन में परेशानी आ जाती हैं। तो कुछ लोगों को अपना जीवन ही परेशानियों से भरा लगने लगता है। लेकिन भगवान श्रीकृष्ण बिना विचलित हुए। जीवन भर संघर्ष करते रहे। युद्ध लड़ते रहे।

  जरासंघ नाम का राजा, हर बार मथुरा पर आक्रमण करता था। श्री कृष्ण ने उसे कई बार, युद्ध में पराजित किया। लेकिन फिर उन्हें लगा कि यह समय और ऊर्जा की बर्बादी है। इसलिए उन्होंने मथुरा को छोड़ दिया। उन्होंने गुजरात जाकर, एक नया नगर बसाया। जिसका नाम द्वारिका था।

      जो युद्ध भूमि उनकी सकारात्मक ऊर्जा  का नाश कर रही थी। उन्होंने उसे छोड़ दिया। इसीलिए वह रणछोड़ भी कहलाते हैं। इसीलिए जीवन में कभी संघर्ष से पीछे मत हटिए। लेकिन जो संघर्ष आपको किसी निष्कर्ष तक न ले जाए। जिससे आपकी उर्जा को नुकसान हो। उसे छोड़ देने में ही, आपकी भलाई है।

Janmashtami ka Shubh Muhurat
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भगवान श्री कृष्ण के जीवन से शिक्षा
Teachings From The Life of Lord Shri Krishna

भगवान श्री कृष्ण का जन्म अष्टमी को हुआ था। इसलिए आप भगवान श्रीकृष्ण के जीवन से 8 बातें सीख सकते हैं। जो आपके जीवन पर उपयुक्त बैठेंगी।

पहली शिक्षा – आप अपने कर्म को सबसे ज्यादा महत्त्व दे। लेकिन फल की चिंता न करें। लक्ष्य की यात्रा तक पहुंचने का आनंद लें। लेकिन हमेशा लक्ष्य को हासिल करने के बारे में, न सोचते रहे।

दूसरी शिक्षा – जीवन में जो कुछ भी घटित होता है। उसका कुछ न कुछ कारण जरूर होता है। जो होता है, अच्छे के लिए होता है। इसलिए हर बात पर उदास होने के बजाए। हर घटना को स्वीकार करना सीखिए। बुरे अनुभवों को पीछे भुलाना सीखिए।

तीसरी शिक्षा – कल क्या होगा। इसकी चिंता छोड़कर। आज जो है, उस का आनंद लीजिए।

चौथी शिक्षा – क्रोध, लोभ और अहंकार नर्क के तीन द्वार हैं। इन तीनों बुरी आदतों को, आज ही त्याग दीजिए। जीवन में शांति को अपनाइए।

पाँचवी शिक्षा – जीवन में आगे बढ़ने के लिए अपना आराम, पैसे, समय और सुरक्षा के भाव का त्याग करने के लिए, हमेशा तैयार रहिये।

छठी शिक्षा – हमेशा विनम्र बनिए। दूसरों को खुशी देने की कोशिश करिए। बिना विनम्रता के बड़ी से बड़ी सफलता भी बेकार है।

सातवीं शिक्षा – कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता। आपको हमेशा अपने काम से प्रेम करना चाहिए।

आठवीं शिक्षा – आज के दौर में अच्छे और सच्चे मित्र बहुत कम मिलते हैं। अगर आपके पास ऐसे मित्र हैं। उन्हें हमेशा सहेज कर रखें। ऐसे मित्र ही हमेशा काम आते हैं।

श्री कृष्ण जन्माष्टमी का शुभ मुहूर्त
Shri Krishna Janmashtami ka Shubh Muhurat

  हिंदू पंचांग के अनुसार, श्री कृष्ण जन्माष्टमी हर साल भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाई जाती है। शास्त्रों में शास्त्रों में जन्माष्टमी का खास महत्व बताया गया है इस दिन भगवान विष्णु के 8वें अवतार श्री कृष्ण का जन्म हुआ था। भगवान कृष्ण का जन्म अष्टमी तिथि को, रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। इसलिए इसका सनातन धर्म में विशेष महत्व है।

श्री कृष्ण जन्माष्टमी 2022 

शुभ मुहूर्त

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी तिथि

18 अगस्त 2022 

दिन गुरुवार

अष्टमी तिथि प्रारंभ

18 अगस्त 2022 

शाम 9:21 पर

अष्टमी तिथि समाप्त

19 अगस्त 2022 

रात्री 10:59

अभिजीत मुहूर्त

18 अगस्त 2022 को दोपहर 12:05 से 12:56 तक

निशिता पूजा मुहूर्त 

18 अगस्त 2022 रात्रि 12:03 से 12:47 तक

रोहिणी नक्षत्र प्रारंभ

20 अगस्त प्रातः 1:53 पर 1:53

रोहिणी नक्षत्र समाप्ति

21 अगस्त प्रातः 4:40

ध्रुव योग

18 अगस्त को रात्रि 8:41 से 19 अगस्त रात्रि 8:59

वृद्धि योग

17 अगस्त 2022 दोपहर 8:56 से 18 अगस्त रात 8:48 तक

राहुकाल

18 अगस्त 2022 दोपहर 2:06 से 3:42 तक

दहीहंडी उत्सव

19 अगस्त 2022

श्री कृष्ण जन्माष्टमी की पूजन सामाग्री
Shri Krishna Janmashtami Pujan Samagri

 भगवान विष्णु ने इस धरती पर कई अवतार लिए। जिसमें हर अवतार की अपनी खासियत और अपनी महिमा थी। लेकिन अगर सबसे मनमोहक और सबसे ज्यादा लोकप्रिय अवतार की बात की जाए। तो वह भगवान श्रीकृष्ण है। भगवान कृष्ण की प्रिय चीजें पूजा में अवश्य शामिल करें। ताकि आपकी पूजा सफल हो।

      आप जानेंगे कि भगवान श्री कृष्ण की पूजा में किन-किन चीजों की आवश्यकता होती है। अन्य शब्दों में कहा जाए। तो किन चीजों के बिना, भगवान श्री कृष्ण की पूजा अधूरी मानी जाती है। धार्मिक ग्रंथों के मुताबिक, जन्माष्टमी के मौके पर भगवान श्री कृष्ण की विधि-विधान से पूजा करने से जातक के सभी संकटों का निवारण होता है।

      साथ ही उसकी सभी प्रकार की मनोकामनाएं भी पूरी होती है। वही ब्रह्मवैवर्त पुराण के मुताबिक, भगवान श्री कृष्ण की पूजा में, जिन 10 चीजों का होना जरूरी माना जाता है। वह इस प्रकार से है –

आसन – भगवान श्री कृष्ण की प्रतिमा सुंदर आसन पर स्थापित करनी चाहिए। आसन लाल, पीला या केसरिया रंग का व मोतियों से सजा हो, तो अति उत्तम है।

पाघ – जिस बर्तन में भगवान के चरणों को धोया जाता है उसे पार्क कहा जाता है इसमें शुद्ध पानी भरकर फूलों की पंखुड़ियां डालनी चाहिए इसमें भगवान को स्नान कराना चाहिए

पंचामृत – यह शहद, घी, दही, दूध व शक्कर को मिलाकर तैयार किया जाता है।

अनुलेपन – पूजा में उपयोग आने वाले दूर्वा, कुमकुम, अक्षत, अबीर, सुगंधित फूल  व शुद्ध जल को अनुलेपन कहा जाता है।

आचमनीय – आचमन शुद्धीकरण के लिए प्रयोग में आने वाले जल को आचमनीय कहते हैं। इसमें सुगंधित इत्र व फूलों को डालना चाहिए।

स्नानीय – श्री कृष्ण के स्नान के लिए प्रयोग में आने वाले द्रव्यों पानी, दूध, इत्र, पुष्प व  सुगंधित पदार्थ को स्नानीय कहा जाता है। जिसका प्रयोग लड्डू गोपाल के स्नान में किया जाता है।

पुष्प – भगवान श्री कृष्ण की पूजा के लिए, सुगंधित व ताजे फूलों का प्रयोग करना चाहिए। इसमें वैजयंती माला अवश्य होनी चाहिए।

भोग – जन्माष्टमी की पूजा के लिए, बनाए जा रहे भोग में मिश्री, ताजी मिठाइयां, ताजे फल, लड्डू, खीर, तुलसी के पत्ते, माखन-मिश्री अवश्य शामिल करना चाहिए।

धूप – विभिन्न पेड़ों के अच्छे गोंद व अन्य सुगंधित पदार्थों से बनी धूप अगरबत्ती श्री कृष्ण को बहुत प्रिय मानी जाती है।

दीप – यह चांदी, तांबे या मिट्टी के बने दिए में गाय का शुद्ध घी डालकर, भगवान की आरती विधि-विधान पूर्वक उतारनी चाहिए।

श्री कृष्ण जन्माष्टमी की पूजन विधि
Shri Krishna Janmashtami ki Pujan Vidhi

  सबसे पहले चौकी पर लाल कपड़ा बिछा दीजिए। भगवान कृष्ण की मूर्ति को चौकी पर, एक पात्र में रखिए। अब दीपक जलाए। साथ में दो धूपबत्ती भी जलाएं। भगवान श्री कृष्ण से प्रार्थना करें। हे भगवान श्रीकृष्ण! कृपया पधारिए और पूजा ग्रहण कीजिए।

       श्री कृष्ण को पंचामृत से स्नान करवाइए। इसके बाद गंगा जल से स्नान करवाइए। इसके बाद श्री कृष्ण को वस्त्र पहनाइए। आसन पर बैठाकर, श्री कृष्ण भगवान का श्रृंगार कीजिए। इसके बाद पंचोपचार पूजा करें। सबसे पहले भगवान कृष्ण को दीपक दिखाइए। इसके बाद धूप दिखाइए। अष्टगंध चंदन या रोली का तिलक लगाएं। इसके साथ ही अक्षत भी तिलक पर लगाइए।

       फिर माखन मिश्री व अन्य भोग सामग्री भगवान को अर्पण कीजिए। तुलसी का पत्ता विशेष रूप से अर्पण कीजिए। पीने के लिए, गंगा जल अर्पण कीजिए। इत्र अर्पण कीजिए। इसके बाद फूल-माला व फूल अर्पण कीजिए। अब श्री कृष्ण का इस प्रकार ध्यान कीजिए। श्री कृष्ण बच्चे के रूप में पीपल के पत्ते पर लेटे हैं। उनके शरीर में अनंत ब्रह्मांड हैं। वह अंगूठा चूस रहे हैं।

      इसके साथ ही श्रीकृष्ण के नाम का अर्थ सहित बार-बार चिंतन कीजिए। कृष का अर्थ है- आकर्षित करना। ण का अर्थ है- परमानंद या पूर्ण मोक्ष। इस प्रकार कृष्ण का अर्थ है। वह जो परमानंद या पूर्ण मोक्ष की ओर आकर्षित करता है। वही कृष्ण है। मैं उन श्री कृष्ण को प्रणाम करता हूं। वह मुझे अपने चरणों में अनन्य भक्ति प्रदान करें।

   । ॐ श्री कृष्णाय शरणं ममः ।

इस मंत्र का निमंत्रण निरंतर जप करने से भगवान श्री कृष्ण की विशेष कृपा प्राप्त होती है सभी दुख दूर होते हैं सभी तकलीफ दूर होती हैं इस मंत्र का मतलब है कि आप भगवान श्री कृष्ण की शरण में पहुंच गए हैं भगवान ने आपको अपनी शरण में ले लिया है अब आप पर कोई भी दुख और तकलीफ नहीं आएगी।

   ‘ॐ नमो भगवते श्री गोविन्दाय’

भगवान श्री कृष्ण के इस द्वादशाक्षर (12)  मंत्र का जो भी जाप करता है। उसे सुख समृद्धि और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। प्रेम विवाह करने वाले लोगों के लिए, यह रामबाण साबित होता है।

कृ कृष्णाय नमः

इस पावन मंत्र को स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने बताया था। इसके जप से जीवन से जुड़ी तमाम बाधाएं दूर होती है। घर व परिवार में सुख और समृद्धि का वास होता है।

श्री कृष्ण जन्माष्टमी का आधायत्मिक महत्व
Spiritual Significance of Shri Krishna Janmashtami

  भारत एक उत्सव पूर्ण देश रहा है। यहां हमने गुरुओं के आसपास, उत्सवों की ऐसी श्रंखला निर्मित की है। कई बार आश्चर्य होता है कि यह देश जीवन को, इतना आनन्दित करने वाला रहा है। कृष्ण का जीवन अपने आप में, हम सबके लिए उदाहरण भी है। उनके जीवन में ही, उनकी सारी शिक्षाएं भी हैं। 

      भगवान श्रीकृष्ण ने कभी नहीं चाहा। कि व्यक्ति अपने जीवन से विमुख होकर, जीवन से अलग होकर, किसी साधना में उतरे। इसीलिए इस देश ने कृष्ण को पूर्ण योगी कहा है। जबकि वह कभी भी जीवन से अलग-थलग नहीं दिखाई देंगे। उनके जीवन का जो भी वर्णन मिलता है। उसमें  ऐसा कहीं नहीं है। कि वह जंगलों में जाकर या हिमालय में जाकर योग साधना कर रहे हो।

     वह जीवन के योग में है। परिपूर्ण योग में हैं। इसीलिए वह पूर्ण योगी हैं। कृष्ण का यही अनूठापन भारत को हमेशा से आंदोलित करता रहा है। श्री कृष्ण जन्माष्टमी के पर्व में भी, अनेकों रहस्य छुपे हुए हैं। जिनको देखना और समझना भी व्यक्ति के लिए, अपने भीतर उतरने का माध्यम बन जाता है।

      आधी रात के अंधेरे में श्री कृष्ण का जन्म होता है। जेल में, इतनी कठिनाइयों के बीच में। यह मनुष्य के भीतर चेतना के नए सूरज के उगने का प्रतीक है। क्योंकि मनुष्य का जीवन ऐसा ही है। अंधेरे से घिरा हुआ। अज्ञान का अंधेरा, उसे हमेशा घेरे हुए है। किसी को जेल में डालने की जरूरत नहीं है। हर कोई जेल में ही है।

     धारणाओं की जेल, मान्यताओं की जेल, अपने-अपने विचारों की जेल, अपनी सीमाओं की जेल। यह सब उसके भीतर चलता हुआ, कार्यभार है। कृष्ण के जन्म की घटना, यह इशारा करती है। कि इसी सारे फैलाव के बीच, इसी सारे जीवन के चक्र के बीच, कभी-कभी ऐसा होता है। कि किसी व्यक्ति के भीतर, उस कृष्ण चेतना का आगमन होता है। उसका जन्म होता है।

     जब ऐसा जन्म घटित होता है। तो उसे जीवन को अनेकों परिवर्तनों से आगे बढ़ाता है। कृष्ण के जन्म के पीछे छुपे यही प्रतीक। अगर हम उन्हें कहानी के रूप में देखें। तो भी खूबसूरत है। उनको भीतर की कहानी की तरह देखें। तो भी खूबसूरत है।

      हमारे देश में ऐसी महान आत्माओं का आगमन, हमेशा से रहस्य पूर्ण रहा है। जब भी उनकी बात होती है। तो परत दर परत कहानी के रूप में होती है। कृष्ण के जीवन में यह कहानियां हमेशा साथ-साथ चलती हैं। चाहे वो उनके जन्म की कहानी हो। चाहे बचपन की कहानी हो। उनके युवावस्था की  कहानी हो।

      यहां तक कि महाभारत के युद्ध की कहानी हो। जब वह गीता का ज्ञान सामने रखते हैं। सबमें बहुत सारी परते हैं। जैसे उनका जन्म हमारे सामने आया। वैसे ही उनके माध्यम से गीता का जन्म भी हमारे सामने आया। वह भी जीवन के युद्ध के बीच में ही प्रकट होते हैं। जीवन से भागकर नही। हैं। भागने की तृष्णा कृष्ण की नहीं है।

     जब कभी भी ऐसा भाव, किसी के भीतर पैदा होता है। यानी कृष्ण चेतना के विकास का, परम चेतना के विकास का। तो जैसा कि यह घटना कहती है। कि जेल के जो पहरेदार थे। वह बेसुध पड़ गए। कृष्ण का निकलना आसान हो गया। किसी को एहसास भी नहीं हुआ। कि ऐसा जन्म हुआ है।

      कृष्ण कभी भी, जीवन से अलग होने की शिक्षा नहीं देते। वह जीवन के साथ चलने की शिक्षा देते हैं। वह कहते हैं कि जब तुम अपने अंदर, उस चेतना को जन्म देने की तैयारी करोगे। सारे संघर्षों, कष्टों, असुविधाओं, विविधताओं, विपरीत परिस्थितियों व असुरक्षितता के बावजूद। तो यह जेल टूटेगी। उससे तुम्हारी मुक्ति होगी।

     यह जो जीवन की जेल बन गई है। धारणाओं, मान्यताओं, विश्वासों, तमाम तरह के आयोजनों की जेल। उससे मार्ग निकलेगा। उससे एक रास्ता फूटेगा। ये जो जीवन का, आधी रात का गहरा अंधेरा है।  वह भी टूटेगा।

       नई सुबह होगी। तो कृष्ण जन्म, जीवन की नई सुबह का जन्म है। वह बाहर किसी व्यक्ति का जन्म नहीं है। जब भी किसी व्यक्ति भीतर नई सुबह जागती है। चेतना का सूर्य झांकने लगता है। जन्म लेने लगता है। तो वह कृष्ण जन्म है। हम सब इसी का उत्सव मनाते हैं।

श्री कृष्ण जी की आरती
Lord Shri Krishna ji ki Aarti

आरती कुंजबिहारी की,श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

 

गले में बैजंती माला, बजावै मुरली मधुर बाला 

श्रवण में कुण्डल झलकाला,नंद के आनंद नंदलाला

 

गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली

लतन में ठाढ़े बनमाली भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक

 

चंद्र सी झलक, ललित छवि श्यामा प्यारी की,

श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की, आरती कुंजबिहारी की…॥

 

कनकमय मोर मुकुट बिलसै, देवता दरसन को तरसैं।

गगन सों सुमन रासि बरसै, बजे मुरचंग,  मधुर मिरदंग ग्वालिन संग।

 

अतुल रति गोप कुमारी की, श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥

॥ आरती कुंजबिहारी की…॥

 

जहां ते प्रकट भई गंगा, सकल मन हारिणि श्री गंगा।

स्मरन ते होत मोह भंगा, बसी शिव सीस।

 

जटा के बीच,हरै अघ कीच, चरन छवि श्रीबनवारी की

 

श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥ ॥ आरती कुंजबिहारी की…॥

 

चमकती उज्ज्वल तट रेनू, बज रही वृंदावन बेनू 

चहुं दिसि गोपि ग्वाल धेनू 

 

हंसत मृदु मंद, चांदनी चंद, कटत भव फंद।

टेर सुन दीन दुखारी की

 

श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥

॥ आरती कुंजबिहारी की…॥

 

आरती कुंजबिहारी की

श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

 

आरती कुंजबिहारी की

 

श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

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