Sant Surdas ka Jivan Parichay | सूरदास जी की जीवनी | जन्मांध का रहस्य

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Sant Surdas Ka Jivan-Parichay in Hindi
भक्त सूरदास का जीवन परिचय

मेरो मन अनत कहाँ सुख पावै।

जैसे उड़ि जहाज़ की पंछी, फिरि जहाज़ पै आवै॥

कमल-नैन को छाँड़ि महातम, और देव को ध्यावै।

परम गंग को छाँड़ि पियासो, दुरमति कूप खनावै॥

जिहिं मधुकर अंबुज-रस चाख्यो, क्यों करील-फल भाव।

‘सूरदास’ प्रभु कामधेनु तजि, छेरी कौन दुहावै॥

        महाकवि सूरदास जी को भक्ति मार्ग का सूर्य कहा जाता है। जिस प्रकार सूर्य एक ही है। अपने प्रकाश और ऊष्मा से, संसार को जीवन प्रदान करता है। उसी प्रकार सूरदास जी ने, अपनी भक्ति की रचनाओं से, मनुष्य में भक्ति-भाव का संचार किया। कृष्ण भक्ति गीत अविरल धारा प्रवाहित करने में उनका विशेष योगदान है।

       वात्सल्य रस के सम्राट महाकवि सूरदास जन्मांध थे। लेकिन इसके बावजूद भी, कृष्ण भक्ति की कविताओं और भजनों में जितना बड़ा नाम सूरदास जी का है। उतना किसी का नहीं है। इनके समानार्थी कृष्ण भक्ति गीतों में, किसी को भी नहीं माना जाता। 

     15वीं और 16वीं शताब्दी का जो भक्ति और सूफी आंदोलन था। उसमें इनके योगदान को देखते हुए। तुलसीदास जी और कबीर दास जी जैसे महान कवियों में इनकी गणना होती है। इन्होंने अपनी कविताओं और रचनाओं जैसे सूरसागर, सूर्य सरावली और साहित्य लहरी में कृष्ण जी के स्वरूप को जिस तरह से दर्शाया है।

     उनकी भक्ति को जिस तरह से अपने साहित्य में उतारा है। वह अद्भुत है। इन्होंने कृष्ण जी के बाल स्वरूप, उनकी यौवन अवस्था को, जिस तरह से प्रस्तुत किया है। उससे पता चलता है कि यह किस श्रेणी के कवि थे। उसमें इनकी भक्ति दिखती है। इनका वात्सल्य दिखता है। इनका जो प्रेम भाव है। जो मिठास है। श्री कृष्ण जी के लिए, वह दिखता है।

Surdas ki Jivani in Hindi

Sant Surdas - An Introduction

 

वात्सल्य रस के सम्राट महाकवि

सूरदास जी 

जीवन-परिचय

वास्तविक नाम

मदन मोहन सारस्वत

प्रसिद्ध नाम

सूरदास जी

जन्म-तिथि

सन 1478 ईसवी (संवत् 1535 विक्रम)

जन्म-स्थान

ग्राम रुनकता, आगरा

सीही (विवादित)

पिता

पंडित रामदास सारस्वत

माता

जमुनादास

पत्नी

रत्नावली

गुरु

आचार्य वल्लभाचार्य

निवास-स्थान

श्रीनाथ मंदिर

जन्म काल

भक्ति काल

भक्ति शाखा

कृष्ण भक्ति

साहित्यिक योगदान

कृष्ण की बाल लीलाओं का मनोहारी चित्रण

ब्रह्म का स्वरूप

सगुण




काव्य कृतियां/ रचनाएं

प्रमुख रचनाएं 

• सूरसागर 

• सूर सरावली 

• साहित्य लहरी 

अन्य रचनाएं

• पद-संग्रह 

• सूर पच्चीसी 

• नल दमयंती 

• नाग लीला 

• गोवर्धन लीला

भाषा

ब्रज भाषा

शैली

गीति मुक्तक शैली

रस

वात्सल्य व श्रंगार

मृत्यु-तिथि

सन 1583 ईस्वी 

(संवत 1640 विक्रम)

मृत्यु-स्थान

पारसौली, मथुरा

महाकवि सूरदास जी का प्रारंभिक जीवन

 सूरदास जी भगवान श्रीकृष्ण के अनन्य उपासक और ब्रजभाषा के श्रेष्ठ कवि माने जाते हैं। सूरदास जी के जन्म स्थान के बारे में मतभेद हैं। सूरदास जी का जन्म संवत् 1535 अर्थात सन 1478 ईसवी माना जाता है। अधिकतर विद्वान इनका जन्म आगरा और मथुरा के बीच स्थित रुनकता नामक गांव में उनका जन्म मानते हैं। 

     जबकि अन्य विद्वान सूरदास जी का जन्म दिल्ली के पास सीही नामक गांव को मानते हैं। इनका जन्म एक निर्धन सारस्वत ब्राह्मण के घर में हुआ था। उनके पिता का नाम पंडित रामदास सारस्वत था। इनके पिता एक प्रसिद्ध गायक थे। इनकी माता जी का नाम जमुनादास था।

    सूरदास जी का वास्तविक नाम मदन मोहन था। सूरदास जी जन्म से ही अंधे थे। सूरदास जी का कंठ बचपन से ही बहुत मधुर था।

सूरदास जी के जन्मांध पर मतभेद

 सूरदास जी के जन्मांध होने के संबंध में भी, विद्वानों में मतभेद हैं। कई ग्रंथों के आधार पर, सूरदास जी को जन्म से अंधा माना गया है। लेकिन राधा-कृष्ण के रूप का सजीव चित्रण, नाना रंगों का वर्णन, सूक्ष्म विश्लेषण आदि गुणों के कारण। अधिकतर विद्वान, सूरदास जी को जन्मांध स्वीकार नहीं करते।

       डॉ० श्यामसुंदर दास जी ने, इस संबंध में लिखा है- “सूर्य वास्तव में जन्मांध नहीं थे। क्योंकि श्रंगार और रूप-रंग का जो वर्णन उन्होंने किया है। वैसा कोई जन्मांध कर ही नहीं सकता।” डॉ० हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है- “सूरसागर के कुछ पदों से, यह ध्वनि अवश्य निकलती है।कि सूरदास अपने को जन्म का अंधा और कर्म का अभागा कहते हैं। पर सब समय, इनके अक्षरार्थ को ही प्रधान नहीं मानना चाहिए।”

       आईने अकबरी के अनुसार, सूरदास को अकबर के दरबारी संगीतज्ञों में माना है।

सूरदास के जन्मांध को लेकर किंवदंतियां

भक्त शिरोमणि सूरदास को लेकर, यह भी कहा जाता है। कि उनका बचपन का नाम मदनमोहन था। वह प्रतिदिन नदी के किनारे जाकर, गीत लिखा करते थे। एक दिन एक लड़की ने, उनका मन मोह लिया। एक दिन वह लड़की नदी के किनारे बैठकर, कपड़े धो रही थी। तभी मदन मोहन का ध्यान उसकी तरफ गया।

       वह एकटक उस लड़की को देखने लगे। अगले दिन वह लड़की उनके पास आई और बोली। आप ही मदनमोहन है। तब सूरदास ने कहा, हां मैं ही मदनमोहन हूं। मैं कविताएं व गीत लिखता और गाता हूं। मैंने आपके लिए भी कुछ गीत लिखे हैं। यह बात जब मदनमोहन के पिता को पता चली। तो वह बहुत क्रोधित हुए।

      तत्पश्चात मदनमोहन घर छोड़कर, वृंदावन आ गए। वहां भी मदनमोहन एक दिन मंदिर में बैठे थे। तभी एक सुंदर स्त्री आई। जिसे देखकर मदनमोहन पुनः मोहित हो गए। फिर वह उस स्त्री के पीछे-पीछे, उसके घर तक पहुंच गए। दरवाजा खटखटाने पर, उसके पति ने दरवाजा खोला। फिर मदन मोहन, जो साधु वेश में थे। उन्हें अंदर ले गए।

       मदनमोहन का सेवा सत्कार किया। जिससे मदन मोहन को अत्यंत आत्मग्लानि हुई। जिस कारण मदन मोहन ने, उनसे अनुरोध पूर्वक दो जलती हुई सलाई मांगी। फिर अचानक गर्म सलाई, अपने आंखों में डाल ली। जिस कारण मदन मोहन अंधे हो गए। उस दंपति को बहुत अफसोस हुआ।

       फिर उन्होंने सूरदास यानी मदन मोहन की कई दिनों तक सेवा की। स्वस्थ होने पर, सूरदास वहां से मथुरा गए आ गए। फिर अपने गुरु वल्लभाचार्य जी के दिशा-निर्देश में कृष्ण भक्ति में लीन हो गए।

सूरदास जी के गुरु

सूरदास की गिनती अष्टछाप के प्रमुख कवियों में होती है। वल्लभाचार्य के पुत्र श्री विट्ठलनाथ जी ने पुष्टिमार्गीय कवियों में से 8 कवियों को चुनकर। सन 1565 ईस्वी में अष्टछाप की स्थापना की। यह 8 कवि हैं – कुंभनदास, सूरदास, परमानंद दास, कृष्ण दास, गोविंद स्वामी, शीत स्वामी, चतुर्भुज दास और नंददास।

       इन 8 कवियों में से प्रथम चार, जिनमें  सूरदास भी शामिल हैं। वल्लभाचार्य जी के शिष्य हैं। जबकि अंतिम चार विट्ठलनाथजी के शिष्य हैं। सूरदास जी आगरा के समीप गऊ घाट पर, श्री वल्लभाचार्य से मिले। फिर उनके शिष्य बन गए। सूरदास गुरु श्री वल्लभाचार्य के संपर्क में आने के बाद, पुष्टिमार्ग में दक्षित हुए।

       उन्हीं की प्रेरणा से सूरदास ने दास्य और दैन्य भाव के पदों की रचना छोड़कर। वात्सल्य, माधुर्य और सखा भाव के पदों की रचना करना आरंभ किया। सूरदास सगुण भक्ति धारा की कृष्ण भक्ति धारा के कवि रहे हैं। उन्होंने काव्य, भक्ति और संगीत की त्रिवेणी प्रवाहित की।

सूरदास जी को भगवान कृष्ण के दर्शन

एक बार सूरदास जी भगवान कृष्ण की भक्ति रस में इतना खो जाते है। कि वह चलते-चलते, एक कुएं में गिर जाते हैं। फिर 6 दिनों तक, उसी कुएं में पड़े रहते हैं। उन्हें अपनी कोई सुध-बुध भी नहीं रहती। वह प्रेम रस में डूबे रहते हैं। सातवें दिन भगवान श्री कृष्ण स्वयं प्रकट होकर, उन्हें दृष्टि प्रदान करते हैं।

        सूरदास भगवान श्री कृष्ण के रूप का जी भर के रसपान करते हैं। फिर भगवान कृष्ण से यही वर मांगते हैं। हे प्रभु! मैंने जिस दृष्टि से आपका दर्शन किया है। अब मैं नहीं चाहता कि इस आंख से, किसी अन्य सांसारिक व्यक्ति या वस्तु को देखूँ।  आपकी छवि और माधुर्य को, अपने चित् में बसाकर। इसी का हमेशा रसपान करना चाहता हूं।

      हे माधव! मुझे अभिलाषा नहीं, किसी अन्य चीज को देखने की। कृपा कर यह नेत्र ज्योति लेकर, पुनः मुझे ज्योतिविहीन बना दें। आखिरकार ऐसा हुआ भी। सूरदास कुएं से निकलने के पश्चात, पुनः दृष्टि विहीन हो गए। ऐसा भी कहा जाता है कि इनके साथ, हमेशा एक लेखक रहा करते थे।

     सूरदास जी के मुख से जो भी छंद या भजन निकलते। जो भी कविताएं निकलती। उन्हें वह लिखते जाते थे। कई अवसरों पर, लेखक के अभाव में, भगवान कृष्ण स्वयं इनके लेखन का काम करते थे। सूरदास के पद बड़े ही अनूठे हैं। जिन्हें पढ़ने से शांति और तृप्ति मिलती है। श्रंगार और वात्सल्य का जैसा वर्णन, भक्त श्री सूरदास के रचनाओं में मिलता है। वैसा अन्यत्र दुर्लभ है।

सूरदास जी को अकबर ने कारावास में डाला

सूरदास के समकालीन मुगल बादशाह अकबर के, दरबारी संगीतज्ञ तानसेन ने, जब सूरदास की कुछ पंक्तियां अकबर को सुनाई। तो अकबर उससे बहुत प्रभावित हुए। वह सूरदास से मिलने के लिए मथुरा आए। अकबर ने सूरदास को, अपना यश वर्णन करने को कहा। 

      लेकिन सूरदास भगवान कृष्ण के अलावा, किसी अन्य चीज का वर्णन नहीं कर पाए। जिस कारण इन्हें कारागार में डाल दिया गया। लेकिन कारागार में भी, सूरदास के चित् में श्री कृष्ण ही कृष्ण व प्रेम ही प्रेम था। जिस कारण इनको वहां से भी जल्दी ही रिहा कर दिया गया।

सूरदास जी की प्रमुख रचनाएं

सूरदास जी के तीन प्रमुख ग्रंथ माने जाते हैं। जिनमें पहला सूरसागर, दूसरा सूर सारावली और तीसरा साहित्य लहरी है। इनमें से सूरसागर ही उनकी अमर कृति है। सूरदास जी ने सवा लाख पदों की रचना की। ऐसा साहित्यकारों का विश्वास है।

      सूरदास के यह पद श्रीमद्भागवत पर आधारित थे। सूरदास ने कृष्ण जन्म से लेकर, मथुरा गमन तक की कथा और कृष्ण की विभिन्न लीलाओं से संबंधित अत्यंत मनोहर पदों की रचना की है।

     सूरदास जी की अन्य प्रमुख अन्य रचनाएं इस प्रकार हैं-

• पद-संग्रह 

• सूर पच्चीसी 

• नल दमयंती 

• नाग लीला 

• गोवर्धन लीला

सूरदास जी की काव्यगत विशेषताएं

सूरदास जी ने वात्सल्य, श्रंगार और शांत रसों को मुख्य रूप से अपनाया है। सूरदास ने अपनी कल्पना व प्रतिभा के सहारे, कृष्ण के बालरूप का अति सुंदर सरस, सजीव और मनोवैज्ञानिक वर्णन किया है। बालक कृष्ण की एक-एक चेष्टा के चित्रण में, सूरदास जी ने कमाल की होशियारी और अपने सूक्ष्म निरीक्षण का परिचय दिया है।

मैया, कबहिं बढ़ैगी चोटी? 

किती बार मोहि दूध पियत भइ, यह अजहूँ है छोटी॥

       सूरदास जी का भ्रमरगीत वियोग श्रृंगार का ही उत्कृष्ट ग्रंथ नहीं है। इसमें सगुण और निर्गुण का भी विवेचन हुआ है। सूरसागर सूरदास जी का प्रधान एवं महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इसमें प्रथम 9 अध्याय संक्षिप्त हैं। लेकिन दशम स्कंध का बहुत विस्तार हो गया है। इसके दो प्रसंग “कृष्ण की बाल लीला” और “भ्रमरगीत” प्रसंग बहुत अधिक महत्वपूर्ण है। 

       भ्रमरगीत के संदर्भ में आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी ने कहा है – “सूरसागर का सबसे मर्मस्पर्शी और वाग्वैदग्ध (eloquent) पूर्ण अंश भ्रमरगीत है।” आचार्य शुक्ल ने लगभग 400 पदों को सूरसागर के भ्रमरगीत से छांटकर, उनको ‘भ्रमरगीत सार’ के रूप में संकलित किया था। भ्रमरगीत में सूरदास ने उन पदों को समाहित किया है।

       जिसमें मथुरा से कृष्ण उद्धव को ब्रज  संदेश लेकर भेजते हैं। भ्रमरगीत में गोपियों की वचनवक्रता(promiscuity) अत्यंत मनोहारी है। ऐसा सुंदर उपालक काव्य कहीं और नहीं मिलता। जो कोमलकांत पदावली, संगीतात्मकता, अलंकार योजना सूर की भाषा में है। उसे देखकर, यही कहा जा सकता है। 

     सूर ने हीं सर्वप्रथम ब्रजभाषा को साहित्यिक रूप दिया है। सूर्य के काव्य में प्राकृतिक सौंदर्य का सूक्ष्म और सजीव वर्णन मिलता है। सूरदास का काव्य भाव पक्ष की दृष्टि से ही महान नहीं है। वह कला पक्ष की दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण है। अलंकार की दृष्टि से भी, उनका कला पक्ष काफी मजबूत है।

       आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने सूर की कवित्व शक्ति के बारे में लिखा है- “सूरदास जब अपने प्रिय विषय का वर्णन शुरू करते है। तो मानो अलंकार शास्त्र हाथ जोड़कर, उनके पीछे-पीछे दौड़ा करता है। उपमाओं की बाढ़ आ जाती है। रूपको की वर्षा होने लगती है।”

सूरदास जी के पदों की व्याख्या

चरन कमल बंदौ हरि राइ।

जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै , अंधे कौ सब कुछ दरसाइ॥

बहिरौ सुनै , गूँग पुनि बोलै , रंक चलै सिर छत्र धराइ।

सूरदास स्वामी करूनामय , बार – बार बंदौं तिहिं पाइ॥

व्याख्या – इस पद में सूरदास जी कहते हैं कि जिस पर हरि की कृपा हो जाती है। उसके लिए असंभव भी संभव हो जाता है। लूला-लंगड़ा मनुष्य भी पर्वत को पार कर जाता है। अंधे को गुप्त और प्रगट, सब कुछ देखने की शक्ति प्राप्त हो जाती है। बहरा सुनने लगता है। गूंगा बोलने लगता है। कंगाल भी राज-छत्र धारण कर लेता है। ऐसे करुणामय प्रभु की, चरण वंदना कौन अभागा है, जो नहीं करेगा।

मैया कबहिं बढ़ैगी चोटी।

किती बार मोहि दूध पिअत भई, यह अजहूँ है छोटी।

तू जो कहति बल क बेनी, ज्यौं, ह्वै है लाँबी मोटी।

काढ़त गुहत न्हवावत ओछत, नागिनि सी भुइँ लोटी।

काचो दूध पिआवत पचि-पचि, देत न माखन रोटी।

सूर श्याम चिरजीवौ दोऊ भैया, हरि हलधर की जोटी।

व्याख्या- सूरदास जी कहते हैं कि श्री कृष्ण अपनी मैया यशोदा से पूछते हैं। कि अब तू ही बता कि मेरी यह छोटी कब बढ़ेगी। तेरे कहे अनुसार, मुझे दूध पीते हुए कितना समय हो गया। लेकिन यह छोटी तो अब तक वैसी की छोटी है।

      अरे भैया! तू तो कहती थी कि दूध पीने से मेरी यह चोटी दाऊ भैया की चोटी जैसी लंबी और मोटी हो जाएगी। लेकिन यह तो अभी दाऊ भैया की चोटी से छोटी है। शायद इसीलिए तू मुझे रोज नहलाकर, मेरे केशों को कंघी से सँवारती है। मेरी छोटी गूंथती है। 

       जिससे यह बढ़कर, नागिन जैसी लंबी हो जाए। मुझे कच्चा दूध भी इसीलिए पिलाती है। अरे मैया! इस चोटी के ही कारण तू मुझे माखन व रोटी भी नहीं देती।

मैया मोहि दाऊ बहुत खिझायो।

मोसो कहत मोल को लीन्हो, तोहि जसुमति कब जायो।

कहा कहौं यहि रिस के मारे, खेलन हौं नहि जात।

पुनि पुनि कहत कौन है माता, कौन तिहारो तात।

गोरे नन्द जसोदा गोरी , तू कत श्याम शरीर।

ताली दै दै हसत ग्वाल, सब सीख देत बलबीर।

तू मोहि को मारन सीखी , दाउहिं कबहु ना खीजै।

मोहन को मुख रिस समेत लखि , जसुदा सुनि सुनि रीझै।

सुनहु कान्ह बलभद्र चबाई , जनमत ही कौ धूत।

सूर, श्याम मोहि गोधन की सौं , मैं माता तू पूत।

व्याख्या- सूरदास जी इन पदों में उल्लेख करते हैं कि जब श्री कृष्ण जी छोटे थे। तब अपने बड़े भाई बलराम के कारण बहुत दुखी होकर, अपनी मैया यशोदा से कहते हैं। हे मैया! बलराम भैया मुझे बहुत चिढ़ाते हैं। मुझे कहते हैं कि मैया ने तुझे मोल-भाव देकर खरीदा है। उनके इसी व्यवहार के कारण, मैं खेलने नहीं जाता।

     वह बार-बार मुझसे पूछते हैं कि मेरे माता-पिता कौन है। नंद बाबा और माता यशोदा दोनों ही गोरे हैं। तो तू सावले रंग वाला कैसे हो गया। और तो और चुटकी दे देकर ग्वाल बाल भी मुझे नचाते हैं। सब मुझ पर हंसते हैं और चिढ़ाते हैं। मैया तूने तो मुझे ही मारना सीखा है। दाऊ भैया को तो आप कभी डाँटती भी नहीं।

     सूरदास जी कहते हैं कि कृष्ण के मुख से क्रोध भरी बातें सुनकर, यशोदा जी मन ही मन मुस्कुराने लगती है। वह कान्हा के ऊपर रीझ जाती है। मन ही मन मुस्कुराते हुए, वे कहती हैं। कन्हैया सुनो, बलराम तो  चुगलखोर है। वह तो जन्म से ही धूर्त है। मेरे श्याम मुझे गोधन की कसम। मुझे सारी गायों की शपथ। मैं ही तुम्हारी माता हूं और तुम मेरे पुत्र हो।

सूरदास जी की मृत्यु

महाकवि सूरदास जी की मृत्यु को लेकर भी विद्वानों में एकमत नही हैं। अलग-अलग पुस्तकों में उनकी मृत्यु का संबंध और सन भी अलग-अलग दिया गया है। सूरदास जी का निधन विक्रम संवत 1640 अर्थात सन 1583 ईस्वी में पारसोली में हुआ। जब सूरदास जी का अंतिम समय निकट था। तब श्री विट्ठलनाथजी ने कहा था- 

“पुष्टिमार्ग का जहाज जात है, जाय कछु लेनो होय सो लेऊँ”

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