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Khatu Shyam Ji ki Kahani in Hindi। क्यों है हरे का सहारा खाटू वाले बाबा श्याम

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Khatu Shyam Baba
हारे का सहारा बाबा श्याम हमारा

जिंदगी कई बार ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती है। जहां से सारे रास्ते ही, बंद नजर आते हैं। ऐसे लगता है। जैसे हम फँस गए हो। समझ ही नहीं आता कि आखिर करें, तो क्या करें। न कोई हमारे दर्द को समझता है। न किसी को हमारी परवाह होती है। जिनसे साथ देने की उम्मीद होती है। वही लोग सबसे पहले, हमारा साथ छोड़ देते हैं। समझ ही नहीं आता। आखिर हमने ऐसी कौन-सी गलती की है। जो जिंदगी हमें इतना रुला रही है।

        जिंदगी के इम्तहान देते-देते, हम थक चुके हैं। हम चाह कर भी,  दुखों से छूट नहीं पाते हैं। अपनी पूरी ताकत, अपनी पूरी बुद्धि लगाने के बाद भी। हमें हमारी परेशानियों का हल नहीं मिलता। लेकिन ऐसे में, हमेशा याद रखना। कोई आपका साथ दे या न दे। लेकिन वह परमात्मा, हमेशा आपके हर सुख-दुख में, आपके साथ खड़ा रहता है। चाहे सब आपको अकेला छोड़ कर चले जाएं। पर वो कभी अकेला नहीं छोड़ सकता।

       जिन लोगों का परमात्मा में विश्वास होता है। वह बड़े से बड़े संकट से व बड़ी से बड़ी मुसीबत से भी बाहर आ जाते हैं। सारा खेल, आपके विश्वास का ही है । मानो तो मैं गंगा मां हूं। न मानो तो बहता पानी। आपको ऐसी हजारों-लाखों मिसाल मिल जाएंगी। जिनके विश्वास ने, उनकी रक्षा की है। जिनकी प्रार्थना ने, उनकी जिंदगी में चमत्कार किया है। ऐसे ही जब भी कभी, आपकी जिंदगी में मुश्किलें आए। कोई मुसीबत की घड़ी आ जाए।

      जब आपको लगे। आपकी शक्ति, आपका सामर्थ्य, आपकी बुद्धि कुछ भी काम नहीं कर रही। आप अब फंस गए हैं। तो ऐसी परिस्थिति में, अगर आप परमात्मा पर विश्वास करते हैं। अपनी प्रार्थना पर विश्वास करते हैं। तो यकीन मानिए। आपकी वह प्रार्थना व विश्वास, आपको बड़े से बड़े संकट से भी बाहर निकाल कर ले आएगा।

Khatu Wale Baba Shyam
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Khatu Shyam - An Introduction

 

पाण्डव कुलभूषण मोरवीनन्दन

 बाबा खाटू श्याम

एक नजर

वास्तविक नाम

वीर बर्बरीक

प्रचलित नाम

खाटू श्याम, श्याम बाबा, हारे का सहारा, शीश के दानी, मोरवीनन्दन, तीन बाणधारी, श्री श्याम, कलयुग के अवतारी,नीले का स्वार, लखदातार,खाटू नरेश, मोर झड़ीधारी

पिता

महाबली घटोत्कच

माता

मोरबी

अवतार

भगवान श्रीकृष्ण

वंशज

पांडव

अवस्थित

सीकर, राजस्थान भारत

वास्तु निर्माता

राजा रूप सिंह चौहान

दादा का नाम

महाबली भीम

दादी का नाम

हिडिंबा

अस्त्र

धनुष व तीन अचूक बाण

जन्म

कार्तिक शुक्ल पक्ष की देवउठनी एकादशी

मेला

फाल्गुनी लक्खी मेला (फाल्गुनी एकादशी मे)

कैसे करे खाटू धाम यात्रा का शुभारंभ
How to Start Khatu Dham Yatra

खाटू श्याम मंदिर राजस्थान के प्रमुख व चमत्कारिक मंदिरों में से एक है। बाबा श्याम की मान्यता व मानने वालों भक्त देश-विदेशों तक है। बाबा खाटू श्याम का मंदिर राजस्थान के सीकर जिले में स्थित है।

कैसे पहुंचे :

वायु मार्ग – वायु मार्ग से आने के लिए, सबसे पास जयपुर अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा है। जयपुर एयरपोर्ट से टैक्सी के द्वारा सीधे खाटू श्याम तक पहुंचा जा सकता है। 

रेल मार्ग – रेल मार्ग से आने के लिए, सबसे नजदीक का रेलवे स्टेशन रींगस है। लेकिन रींगस की सभी जगह से, connectivity नहीं है। इसलिए आपको जयपुर या सीकर आना होगा। जयपुर व सीकर से रींगस के लिए, कुछ ट्रेनें उपलब्ध है।

सड़क मार्ग – सड़क द्वारा आने के लिए भी, आपको जयपुर तक आना होगा। जयपुर से खाटू श्याम की दूरी 85 किलोमीटर है। जयपुर के सिंधी कैंप बस स्टैंड से, खाटू श्याम के लिए बसें उपलब्ध हैं। अगर आप अपने साधन से आना चाहते हैं। तो google maps का भी सहारा ले सकते हैं।

    रींगस से खाटू श्याम की दूरी लगभग 17 किमी है। जिसे श्याम प्रेमी पैदल ही तय करते है। रींगस से मंदिर तक जाने के लिए बहुत से Private Conveyance उपलब्ध है। आप रींगस से मंदिर तक आसानी से आ सकते है।

क्या देखें :

खाटू श्याम में सबसे पहले, तो आपको खाटू श्याम बाबा के प्राचीन मंदिर के दर्शन करने चाहिए। यहीं पर शीश के दानी का शीश अवतरित हुआ था। खाटू बाबा का असली मंदिर यहीं पर है। खाटू श्याम मंदिर के पास में ही श्याम वाटिका है। मंदिर के आस-पास अच्छा खासा बाजार है। जहां पर आप खरीददारी भी कर सकते हैं। 

    मंदिर से एक किलोमीटर की दूरी पर श्याम कुंड है। जिसमें स्नान करने का विशेष महत्व है। यही पर श्याम बाबा का शीश अवतरित हुआ था। श्याम कुंड की विशेष मानता है कि यहां पर स्नान से, सभी दोषों का विनाश होता है। श्याम कुंड के पास ही माताजी व हनुमान जी का मंदिर हैं। इनके भी दर्शन अवश्य करें।

      खाटू श्याम से 25-30 किमी की दूरी पर, श्री जीण माता जी का मंदिर है। आप यहां भी जा सकते हैं। खाटू श्याम जी से 100 किलोमीटर की दूरी पर, सालासर बालाजी का प्राचीन मंदिर है। आप समय की उपलब्धता के आधार पर, यहां भी आ सकते हैं।

कहाँ ठहरें :

खाटू श्याम ठहरने के लिए, बहुत सारी अत्याधुनिक होटल व धर्मशालाये हैं। जिनमें ठहरने की उत्तम सुविधाएं मौजूद हैं। यहां लगभग 300 धर्मशालाये हैं। यहाँ  बड़ी संख्या में होटल्स भी मौजूद हैं। खाटू मंदिर मार्ग में व मंदिर के आस-पास बहुत-सी धर्मशालाये हैं। उनमें मुख्य श्री श्याम पंचायती विश्राम स्थल धर्मशाला, श्री श्याम मित्र मंडल कोलकाता धर्मशाला, श्री गढ़वाली धर्मशाला, श्री श्याम धर्मशाला, श्री श्याम मंडल रेवाड़ी धर्मशाला, कानपुर धर्मशाला आदि प्रमुख हैं।

        इसी कड़ी में देखा जाए। तो खाटू श्याम में बहुत सारे सुख-सुविधाओं से युक्त होटल भी है। जिनमें प्रमुख होटल मोरबी, होटल श्याम सखी, होटल सांवरिया, होटल लखदातार आदि हैं।

कौन है खाटू श्याम?
Who is Khatu Shyam Baba

भारत में बहुत से चमत्कारिक धार्मिक स्थल हैं। खाटू श्याम मंदिर, इन्हीं प्रसिद्ध स्थलों में से एक है। यहां पर देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु गण आते हैं। यह मंदिर भीम के पोते और घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक का है। जहां इनकी श्याम के रूप में पूजा की जाती है। ऐसी मान्यता है कि जो भी इस मंदिर में आता है। उसकी सभी मनोकामनाये पूरी होती है। एक मान्यता के अनुसार, बाबा खाटू श्याम के जितने बार भी दर्शन किए जाएं। हर बार, उनका रूप अलग मिलता है।

वीर बर्बरीक का जन्म स्थान

महा शूरवीर पांडव जब अज्ञातवास में थे। तो एक दिन भीम जंगल में जा रहे थे। तभी हिडिंबा नाम की एक राक्षसी, उन पर मोहित हो गई। भीम ने उसके भाई हिडिंब के साथ युद्ध किया। जो बेहद शक्तिशाली था। हिडिंब को परास्त करके,भीम ने हिडिंबा से विवाह किया। उन दोनों के मिलन से, घटोत्कच नाम का एक पुत्र प्राप्त हुआ। घटोत्कच अपने पिता से भी ज्यादा शूरवीर योद्धा था। 

  एक दिन घटोत्कच अपने पिता और अपने परिजनों के दर्शन के लिए आए। तब श्री कृष्ण ने पांडवों से, घटोत्कच का शीघ्र विवाह कराने को कहा। तब पांडवों ने भगवान श्री कृष्ण से अनुरोध किया। कि आप ही घटोत्कच के लिए, किसी योग्य वधू का चयन करें। इस पर श्री कृष्ण ने, असुरों के शिल्पी, मूर दैत्य की परम बुद्धिमान और वीर कन्या कामकंटका, जिसे मोरबी नाम से भी जाना जाता है। उसे घटोत्कच के लिए, सबसे योग्य वधु चुना।

    लेकिन मोरबी ने अपने विवाह के लिए, एक शर्त रखी थी। कि जो भी उसे शस्त्र और शास्त्रार्थ में पराजित करेगा। उसी से विवाह करेगी। तब श्री कृष्ण स्वयं घटोत्कच को दीक्षित करके, उसका वरण करने के लिए भेजा। घटोत्कच ने मोरबी को शस्त्र और शास्त्रार्थ दोनों में पराजित कर विवाह  किया। घटोत्कच अपनी पत्नी मोरबी को लेकर हिडिंब वन आ गए। 

      यहीं पर मोरबी ने एक अद्भुत बालक को जन्म दिया। जिसके बाल बब्बर शेर जैसे घुंघराले थे। इसीलिए घटोत्कच ने उनका नाम बर्बरीक रखा। कलयुग के अवतार बाबा श्याम, जिन्हें मोरवी नंदन भी कहा जाता है। स्कंद पुराण के अनुसार, इनका जन्म स्थान हिडिंब वन है। हिडिंब वन को, अगर आज के परिपेक्ष में देखें। तो यह हिमाचल प्रदेश व कुछ नेपाल का हिस्से में आता है।

वीर बर्बरीक का बाल्यकाल

बर्बरीक बचपन में ही अत्यंत ही चमत्कारिक थे। वे जन्म लेते ही, पूर्ण रुप से विकसित हो गए। जब उस बालक को लेकर, घटोत्कच श्री कृष्ण के पास गए। तब बालक बर्बरीक ने श्री कृष्ण से पूछा। हे प्रभु, इस जीवन का सर्वोत्तम उपयोग क्या है। श्री कृष्ण ने उनके ऐसे विचारों से, प्रभावित होकर कहा। हे पुत्र! इस जीवन का सर्वोत्तम उपयोग परोपकारी एवं निर्बलों का साथी बनकर, सदैव धर्म का साथ देने में है।

       इसके लिए तुम्हें शक्तियां अर्जित करनी पड़ेगी। इसलिए तुम महिसागर गुप्त क्षेत्र में जाकर, देवी सिद्ध अंबिका व नौ दुर्गा की आराधना करो। उनसे शक्तियों को प्राप्त करो। बर्बरीक भगवान के आदेश का पालन करते हुए। महिसागर में सिद्ध अंबिका की आराधना करने लगे। प्रसन्न होकर बर्बरीक को सिद्ध अंबिका ने तीन बाण और कई अद्भुत शक्तियां प्रदान की। इन तीन दिव्य बाणों से, तीनो लोकों पर विजय प्राप्त की जा सकती थी। देवी ने उन्हें चन्डिल नाम से अलंकृत किया।

        वीर बर्बरीक ने ब्रहमचारी होने का प्रण लिया था। उन्होंने पृथ्वी और पाताल के बीच रहने वाली, नाग कन्याओं के विवाह का प्रस्ताव ठुकरा दिया। उन्होंने कहा कि वह आजीवन ब्रहमचारी रहने का प्रण कर चुके हैं। उन्होंने सदैव निर्बल की, असहाय लोगों की व हारे हुए लोगों की सहायता करने का व्रत लिया है। इसीलिए बाबा को ‘हारे का सारा’ कहा जाता है।

क्यो किया अपने शीश का दान
खाटू श्याम बाबा की संपूर्ण कथा

खाटू श्याम बाबा की कहानी महाभारत काल से शुरू होती है। खाटू श्याम बाबा को ही, पहले बर्बरीक के नाम से जाना जाता था। युद्ध की अद्भुत कला बर्बरीक ने, अपनी मां मोरवी से सीखी। इसके बाद एक मतानुसार, बर्बरीक ने भगवान शिव की घोर तपस्या की। भोलेनाथ शिव को प्रसन्न करके, तीन अभेद बाण प्राप्त किए। यह बाण ऐसे थे। जिनसे तीनो लोकों को जीता जा सकता था।

      इन तीनों बाणों को चलाने के लिए, एक विशेष धनुष की आवश्यकता थी। इसके लिए बर्बरीक ने, अग्नि देव की तपस्या की। तब अग्नि देव ने प्रसन्न होकर, उन्हें यह धनुष प्रदान किया। जो उन्हें तीनों लोकों में विजयी बनाने में समर्थ था। तभी कौरवों और पांडवों के बीच भयंकर युद्ध चल रहा था। युद्ध की जानकारी मिलते ही, बर्बरीक की भी इच्छा युद्ध में जाने की हुई। बर्बरीक ने अपनी मां से युद्ध में जाने की आज्ञा व आशीर्वाद मांगा।

       उनकी मां जानती थी कि यह युद्ध कौरवों और पांडवों की बीच चल रहा है। उन्होंने सोचा कि कौरवों के पास, तो बड़े-बड़े योद्धा व विशाल सेना हैं। पांडव इतनी बड़ी विशाल सेना के सामने कमजोर पड़ जाएंगे। तब मोरवी ने बर्बरीक से एक वचन लिया लिया। कि जो भी पक्ष तुम्हें हारता हुआ मिलेगा। तुम उस की ओर से यह युद्ध लड़ोगे। बर्बरीक ने अपनी मां को वचन दिया कि जो भी पक्ष हार रहा होगा। मैं उसी की सहायता करूंगा।

       फिर बर्बरीक अपने प्रिय नीले घोड़े पर सवार होकर। शिवजी से प्राप्त धनुष और अभेद बाण के साथ, कुरुक्षेत्र की युद्ध भूमि की ओर निकल पड़े। अब भगवान कृष्ण के लिए बड़ी समस्या हो गई क्योंकि उस समय और और भारती ओर जा रहे थे बर्बरीक के वचन के अनुसार, वह हारे के सहारे बनेंगे। यदि बर्बरीक कौरवों के साथ शामिल हो जाते। तब कौरवों को हरा पाना। किसी भी स्थित में संभव नहीं था। 

        ऐसा सोचकर भगवान श्री कृष्ण ने, ब्राह्मण का रूप धारण कर, उन्हें रास्ते में ही  रोक लिया। उन्होंने बर्बरीक से युद्ध में जाने का कारण पूछा। कारण जानकर उन्होंने बर्बरीक की हंसी उड़ाई। तब बर्बरीक ने अपने तीन बाणों को दिखाते हुए कहा। कि मेरा मात्र एक ही बाण, शत्रु का विनाश करने के लिए पर्याप्त है। ऐसा करने के बाद, बाण तरकश में ही वापस आएगा। 

       इस तरह, मुझे दूसरे बाण को चलाने की आवश्यकता ही नहीं होगी। इस युद्ध को जीतने के लिए, मुझे एक ही बाण चाहिए। मेरे पास तो तीन बाण हैं। अगर एक बार इस बाण को चला दिया जाए। तो यह सभी को मारकर ही वापस आएगा। अगर तीनों बाणों को उपयोग में ले लिया गया। तो यह निश्चित है। कि तीनों लोकों में हाहाकार मच जाएगा।

क्यो भगवान श्री कृष्ण ने ली, वीर बर्बरीक की परीक्षा

ब्राह्मण बने भगवान कृष्ण ने बर्बरीक से कहा। अगर यह इतने ही चमत्कारी है। तो मैं भी इनका चमत्कार देखना चाहता हूं। भगवान श्री कृष्ण ने बर्बरीक को चुनौती दी। अगर वास्तव में, यह बाण चमत्कारी है। तो इस पीपल के पेड़ के सभी पत्तो को, जो पेड़ पर है व निचे गिरे है। उन सभी को एक बाण से भेदकर दिखाओ। बर्बरीक ने कहा, इसमें कौन-सी बड़ी बात हैं। 

      बर्बरीक ने भगवान शिव का स्मरण करके। अपने तुरीड से एक बाण निकाल कर पेड़ की ओर चला दिया। बाण ने पलक झपकने से पहले ही, सभी पत्तो को भेद दिया। फिर बाद में, वह बाण भगवान श्री कृष्ण के पैरों के इर्द-गिर्द चक्कर लगाने लगा। क्योंकि एक पत्ता उन्होंने अपने पैरों के नीचे छुपा रखा था। बाण उसे भी भेदना चाहता था। तब बर्बरीक ने ब्राह्मण देवता से कहा। आप तुरंत ही पैरों को हटा लीजिए। वरना ये बाण आपके पैरों को भी चोट पहुंचा सकता है। 

    भगवान कृष्ण समझ चुके थे। यह भगवान शिव के वरदान का परिणाम है। तब उन्होंने बर्बरीक से पूछा कि वह इस युद्ध में, किसकी ओर से शामिल होगा। बर्बरीक ने कहा, इस युद्ध में जो भी हार रहा होगा। वो उसका साथ देंगे। यह अटल सत्य है। क्योंकि मैं अपनी माता को को वचन दे कर आया हूं।

      बाबा श्याम ने जिस पीपल के पेड़ के पत्ते छेदे थे। वह हिसार डिस्ट्रिक्ट में तलवंडी राणा के समीप, पीर बबराण गांव में है। वहां पर अभी भी, वह पीपल का पेड़ है। जब भी उस पीपल के पेड़ पर नए पत्ते आते हैं। तो कुछ दिनों तक, तो वह ठीक रहते हैं। बाद में, अपने आप उसमें छेद हो जाते है।

भगवान श्री कृष्ण ने क्यो लिया, बर्बरीक के शीश का दान

भगवान श्रीकृष्ण जानते थे कि अगर बर्बरीक ने कौरवों का साथ दिया। तो निश्चित रूप से युद्व का परिणाम, कुछ और ही होगा। इसलिए उन्होंने बर्बरीक से कहा कि वह उससे कुछ दान में चाहते हैं। वीर बर्बरीक ने कहा। मांगो, जो मांगना चाहते हो। तुम्हे वचन देता हूं। अगर तुम्हारी अभिलाषा, मेरे वश में होगी। तो मैं अवश्य ही पूरा करूंगा। तब ब्राह्मण बने श्री कृष्ण ने दान में उनका शीश मांग लिया।

        वीर बर्बरीक क्षण भर के लिए, तो सोच में पड़ गए। लेकिन अगले ही पल, अपने वचन की दृढ़ता को याद करके हामी भरी। तब बर्बरीक समझ गए। कि यह कोई साधारण ब्राह्मण नहीं है। बर्बरीक ने उनसे, उनके वास्तविक रूप में आने की प्रार्थना की। तब भगवान कृष्ण ने उन्हें, अपने विराट रूप के दर्शन कराएं। बर्बरीक ने भगवान कृष्ण से निवेदन किया। कि वह युद्ध की समाप्ति तक, इस युद्ध को देखना चाहते हैं। भगवान कृष्ण ने उनकी यह बात स्वीकार कर ली।

       भगवान कृष्ण की स्वीकृति मिलते ही। बर्बरीक ने तलवार से, अपना शीश काटकर उन्हें सौप दिया। वह फाल्गुन मास की  द्वादशी का दिन था। भगवान के वचनों के अनुसार, बर्बरीक का शीष युद्ध भूमि के समीप, एक पहाड़ी पर सुशोभित कर दिया गया। जहां से बर्बरीक ने देखा संपूर्ण युद्ध को देखा।

जब बर्बरीक ने पांडवो का घमंड तोड़ा

महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ। युद्ध खत्म होने पर, पांडवों में आपस में कहासुनी होने लगी। युद्ध में विजय का श्रेय किसे जाता है। श्रेष्ठ योद्धा कौन था। तब भगवान श्री कृष्ण ने सुझाव दिया। क्यों न हम बर्बरीक के शीश से पूछ लें। क्योंकि उनका शीश युद्ध का एकमात्र ऐसा साक्षी है। जिसने संपूर्ण यह युद्ध को देखा है। भला उससे बेहतर निर्णायक कौन हो सकता है।

      सभी भगवान कृष्ण की बात से सहमत हो गए। सभी इस बात को पूछने के लिए, बर्बरीक के शीश के पास गए हैं। सभी ने बर्बरीक के शीश से, अपनी जिज्ञासा रखी। बताओ कौन है। जो इस युद्ध में श्रेष्ठ योद्धा रहा। उनके शीश ने उत्तर दिया। इस संपूर्ण युद्ध में श्री कृष्ण ही विजय प्राप्त कराने में, सबसे महान पात्र हैं। उन्हें पूरी युद्ध भूमि में, केवल उनका सुदर्शन चक्र ही घूमता दिखाई दे रहा था। जो शत्रु सेना को काट रहा था।

       महाकाली दुर्गा भगवान श्री कृष्ण के आदेश पर, शत्रु सेना के रक्त से भरे प्यालों का सेवन कर रही थी। तब भगवान श्री कृष्ण ने, वीर बर्बरीक को उसके महान बलिदान से प्रसन्न होकर वरदान दिया। हे बर्बरीक, तुम्हारे जैसा बलिदान कोई और नहीं कर सकता है। कलयुग में, तुम मेरे श्याम नाम से जाने जाओगे। क्योंकि कलयुग में हारे हुए, का साथ देने वाला ही श्याम नाम को धारण करने में समर्थ है।

       तुमने अपना शीश मुझे दान दिया है। अतः तुम “शीश के दानी” के नाम से भी पूजे जाओगे। तुमने हारने वाले का साथ देने का वचन, अपनी मां को दिया था। इसीलिए तुम सदैव “हारे के सारे” बनोगे। जो भी भक्त कलयुग में, तुम्हारी पूजा करेगा। उसकी समस्त मनोकामनाएं, अवश्य ही पूरी होंगी।

बाबा श्याम का धड़ (शरीर) कहा है

बाबा श्याम के शरीर को लेकर बहुत सारे अलग-अलग मत हैं। तो पहले समझते हैं। कि पुराणों में बाबा की शरीर के बारे में क्या उल्लेख किया गया है। वेद व्यास जी द्वारा रचित स्कंध पुराण में, बाबा श्याम का पूर्ण विवरण दिया गया है। स्कंद पुराण के प्रथम खंड, महेश्वर खंड के कौमारिक खंड में बाबा श्याम की कथा का बहुत ही सुंदर ढंग से उल्लेख किया गया है।

    स्कंद पुराण के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण ने बर्बरीक जी के शरीर का अंतिम संस्कार करा दिया था। बस शीश का अंतिम संस्कार नहीं किया गया था। क्योंकि देवियों से आवाहन करके, भगवान श्री कृष्ण ने उनके शीश को अमृत से सिंचित करवा दिया था। फिर उनके शीश को अमरता व पूजित होने का वरदान दे दिया था। इस तरह शीश तो पूजित हो गया था। लेकिन धड़ का अंतिम संस्कार करवा दिया गया था।

कैसे श्याम बाबा का शीश, खाटू धाम पहुँचा

राजस्थान और हरियाणा में बहुत से कुँए व बाबरिया होती हैं। इन कुँए और बाबरियों का क्या रहस्य है। क्या यहां पर कभी नदियां बहती थी। विशेषकर राजस्थान में। जयपुर के महान इतिहासकार पंडित झाबरमल शर्मा जी के अनुसार, राजस्थान में पाए जाने वाले, सभी जल के स्रोत। प्राचीन समय में वहां बहने वाली नदियों से ही बने हैं। लेकिन प्रश्न उठता है। कि द्वापर युग से आज कलयुग में वो नदियां कहां गई।

    आपको पता होना चाहिए कि महाभारत के युद्ध की समाप्ति के बाद। बर्बरीक के शीश ने पांडवों के अभिमान का मर्दन किया था। इसके बाद, भगवान श्री कृष्ण ने बर्बरीक को पूजनीय होने का आशीर्वाद दिया। पूजनीय होने का यह आशीर्वाद, हमें स्कंध पुराण के कौमारी खंड में मिलता है। इसके बाद बर्बरीक के उस अमर शीश को, पास में बहने वाली रुपमती नदी में प्रवाहित करवा दिया गया। यह रुपमती नदी, खाटू से होकर जाती थी।

        बर्बरीक का शीश बहते-बहते खाटू पहुंचा। फिर आज वो नदी कहां है। तो महाभारत के युद्ध की समाप्ति के बाद।० अश्वत्थामा कौरव वंश के सर्वनाश से बहुत ज्यादा क्रोध में आ गए। उन्होंने ब्रम्हास्त्र (आज का हाइड्रोजन बम) का संधान किया। यह देखकर अर्जुन ने भी ब्रम्हास्त्र का संधान किया। भगवान कृष्ण जानते थे। कि अगर दोनों तरफ से ब्रम्हास्त्र चलेंगे। तो दोनो की तरफ का सर्वनाश होना, निश्चित है।

       भगवान श्री कृष्ण ने अश्वत्थामा और अर्जुन को बहुत समझाया। उनकी बात मानकर अर्जुन ने तो ब्रम्हास्त्र को वापस ले लिया। लेकिन अश्वत्थामा को ब्रम्हास्त्र  वापस लेने की कला नहीं आती थी। कहा जाता है कि उस समय अश्वत्थामा ने ब्रम्हास्त्र को उसी जगह छोड़ा। जो आज का राजस्थान है। उसकी गर्मी से, वहां जो नदियां व जल-स्रोत थे। वो सब सूख गए। लेकिन बाबा श्याम का शीश खाटू में ही रह गया। खाटू धाम में श्याम कुंड, एक प्राकृतिक कुंड है। यहीं पर बाबा श्याम का शीश प्रकट हुआ। 

       इसलिए खाटू धाम की यात्रा रींगस से शुरू होती है बाबा श्याम का शीश रींगस से होकर ही खाटू धाम तक गया था। जिसके कारण, भक्तजन रींगस से खाटू तक की जमीन को पवित्र मानते हैं। इसीलिए रींगस से श्याम प्रेमी निशान यात्रा लेकर, नंगे पैर खाटू धाम तक जाते हैं।

खाटू श्याम जी की आरती

ॐ जय श्री श्याम हरे,बाबा जय श्री श्याम हरे।

खाटू धाम विराजत, अनुपम रूप धरे।।

ओम जय श्री श्याम हरे ……।।

रत्न जड़ित सिंहासन, सिर पर चंवर ढुरे।

तन केसरिया बागो, कुंडल श्रवण पड़े।।

ॐ जय श्री श्याम हरे ……।।

गल पुष्पों की माला, सिर पर मुकुट धरे।

खेवत धूप अग्नि पर, दीपक ज्योति जले।। 

ॐ जय श्री श्याम हरे …….।।

मोदक खीर चूरमा, सुवरण थाल भरे।

सेवक भोग लगावत, सेवा नित्य करें।।

ॐ जय श्री श्याम हरे…….।।

झांझ कटोरा और घड़ियावल, शंख मृदंग घुरे। 

भक्त आरती गावे, जय-जयकार करें।।

ॐ जय श्री श्याम हरे…….।।

जो ध्यावे फल पावे, सब दुख से उबरे।

सेवक जन निज मुख से, श्री श्याम-श्याम उचरे।। 

ॐ जय श्री श्याम हरे …….।।

श्री श्याम बिहारी जी की आरती, जो कोई नर गावे। 

कहत भक्तजन, मनवांछित फल पावे।। 

ॐ जय श्री श्याम हरे ……..।।

जय श्री श्याम हरे, बाबा जय श्री श्याम हरे।

निज भक्तों के तुमने, पूरण काज करें।।

ॐ जय श्री श्याम हरे ……..।।

ॐ जय श्री श्याम हरे, बाबा जय श्री श्याम हरे। 

खाटू धाम विराजत, अनुपम रूप धरे।। 

ॐ जय श्री श्याम हरे …….।।

हाथ जोड़ विनती करूं, तो सुनियो चित्त लगाए। 

दास आगे आ गयो शरण में, राखियो इसकी लाज।।

           ।। ॐ जय श्री श्याम ।।

F.A.Qs

प्र०  खाटू श्याम जी का मंदिर कहाँ है?

उ०  बाबा खाटू श्याम का मंदिर राजस्थान के सीकर जिले में रींगस के पास स्थित है।

 

प्र०  खाटू श्यामजी कौन है?

उ०  खाटू श्याम, भीम के पोते और घटोत्कत के पुत्र बर्बरीक है।

 

प्र०  खाटू श्याम जी का असली नाम क्या है?

उ०  घटोत्कच व मोरवी के पुत्र बर्बरीक। इसीलिए इन्हें मोरवीनन्दन भी कहा जाता है।

 

प्र०  खाटू श्यामजी में किसकी पूजा होती है?

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उ० भगवान श्रीकृष्ण के रूप में खाटू श्यामजी की पूजा होती है।

 

प्र०  शीश के दानी कौन है?

उ०  खाटू श्यामजी

 

प्र०  खाटू श्यामजी का जन्मदिन कब होता है?

उ०  प्रत्येक वर्ष की कार्तिक शुक्ल पक्ष की देव उठनी एकादशी को खाटू श्याम जी जन्मदिन मनाया जाता है। 2022 में खाटू श्यामजी का जन्मदिन 4 नवम्बर दिन शुक्रवार को है।

 

प्र०  बर्बरीक जी का धड़ कहाँ है?

उ० स्कंध पुराण के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण ने बर्बरीक जी के शरीर का अंतिम संस्कार करा दिया था।

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