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Swami Vivekananda – Inspirational Biography in Hindi | नरेंद्र नाथ दत्त से स्वामी विवेकानंद तक का सफर

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Swami Vivekananda Biography in Hindi

हमारा देश भारत सदियों से महापुरुषों की जन्मभूमि और कर्मभूमि रही है। इस पावन धरती पर, बहुत से ऐसे मनीषि पैदा हुए हैं। जिन्होंने अपने चिंतन व दर्शन से, न केवल भारत। बल्कि पूरी दुनिया को गौरवान्वित किया है। ऐसे ही एक व्यक्ति थे। जिन्हें पूरी दुनिया अनुसरण(follow) करती है। बहुत महान लोगों ने इनसे प्रेरणा ली है। जिनमें सुभाष चंद्र बोस, लाल बहादुर शास्त्री, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, महात्मा गांधी, महान वैज्ञानिक निकोला टेस्ला शामिल हैं।

ऐसे नामों बहुत लंबी कतार है। जिसमे हर किसी ने, इनसे प्रेरणा ली है। यही वह पहले इंसान थे। जिन्होंने हमारे वेदों की ताकत, हमारे उपनिषदों की ताकत को पूरी दुनिया में फैला दिया। पूरी दुनिया को, इसके आगे नतमस्तक होने के लिए मजबूर कर दिया। हिंदुत्व की ताकत को बताते हुए। पूरी दुनिया को एहसास करवा दिया कि हिंदुस्तान ही पूरे विश्व का जगतगुरु है। यह थे, हमारे परम पूज्य स्वामी विवेकानंद जी।

Swami Vivekananda Biography
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Swami Vivekananda - एक परिचय

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वास्तविक नाम

नरेंद्र नाथ दत्त

पहचान

स्वामी विवेकानंद

जन्म

12 जनवरी 1863

जन्म स्थान

कलकत्ता( प० बंगाल)

पिता

विश्वनाथ दत्त

माता

भुवनेश्वर देवी

शिक्षा

बी०ए० उत्तीर्ण

प्रारम्भिक

विद्यालय

ईश्वर चंद्र विद्यासागर मेट्रोपॉलिटन इंस्टिट्यूट, कोलकत्ता

कालेज

प्रेसीडेंसी यूनिवर्सिटी कोलकाता

गुरु

रामकृष्ण परमहंस

भाई-बहन

9

राष्ट्रीयता

भारतीय

मृत्यु

4 जुलाई, 1902

मृत्यु स्थान

बेलूर, प० बंगाल


प्रसिद्ध कथन

उठो,जागो और तब तक नही रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाये

संस्थापक

रामकृष्ण मिशन, रामकृष्ण मठ

स्वामी विवेकानंद का बचपन
Childhood of Swami Vivekananda

स्वामी विवेकानंद जी का जन्म 12 जनवरी 1863 में मकर संक्रांति के दिन हुआ था। उनका जन्म कोलकाता शहर के, एक हिंदू बंगाली कायस्थ परिवार में हुआ। वह 9 भाई-बहनों में से एक थे। उनके पिता विश्वनाथ दत्त, जो कोलकाता हाई कोर्ट में अटॉर्नी-एट-लॉ थे। वे उस समय के एक सफल व नामी अधिवक्ता (advocate) थे। इसके साथ वह अंग्रेजी और फारसी के अच्छे जानकार भी थे। उन्हें सभी सुख सुविधाएं अच्छी लगती थी। उन पर पाश्चात्य सभ्यता का गहरा प्रभाव था। वह अपने पुत्र नरेंद्र को भी अंग्रेजी शिक्षा देकर, पाश्चात्य सभ्यता के तौर तरीके पर चलाना चाहते थे।

ऐसा भी माना जाता है कि बचपन में उनकी माता भुवनेश्वरी देवी ने, उनका नाम वीरेश्वर रखा था। बाद में उनका नाम बदलकर नरेंद्र नाथ दत्त रखा गया। जिन्हें प्यार से नरेन भी पुकारा जाता था। इनकी माता धार्मिक प्रवृत्ति की एक विद्वान महिला थी। उन्हें भगवत गीता और रामायण जैसे धार्मिक ग्रंथों में पारंगत हासिल थी। ऐसे में स्वाभाविक था। जहां घर में ही उन्हें पाश्चात्य अंग्रेजी भाषा का प्रारंभिक ज्ञान मिला। वही उन्हें अपनी मां से, हिंदू धर्म और संस्कृति को करीब से जानने और समझने का मौका मिला। अपनी मां का नरेंद्र पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा। वह घर में ही ईश्वर की भक्ति व ध्यान में खो जाया करते थे। नरेंद्र को बचपन से ही ईश्वर को जानने और उन्हें प्राप्त करने की लालसा थी।

स्वामी विवेकानंद पर बचपन का प्रभाव
Influence of Childhood on Swami Vivekananda

  नरेंद्र सब बच्चों से अलग थे। इसलिए शायद उन्हें सपने भी अलग आते थे। एक बार उन्हें सपने में, एक चमकता हुआ गोला दिखाई दिया। जिसमें से बहुत रोशनी निकल रही थी। जिसका रंग लगातार बदलता ही जा रहा था। वह गोला धीरे-धीरे और बड़ा होता जा रहा था। एक स्थिति पर आकर वह फूट गया। फिर उससे निकलने वाली सफेद रोशनी, उनके ऊपर गिरने लगी।उस रोशनी ने उन्हें पूरी तरह से ढक लिया। 

    छोटी उम्र में ही, वह अलग-अलग religion जैसे हिंदू-मुस्लिम और अमीर-गरीब में भेदभाव करने के लिए सवाल उठाते थे। बचपन में एक बार, उन्होंने अपने पिता से पूछा। पिताजी, आपने मेरे लिए क्या किया है। उनके पिता ने उन्हें, दर्पण (mirror) देखने के लिए कहा। उन्होंने कहा, अपने आप को इस दर्पण में देखो। तुम समझ जाओगे कि मैंने तुम्हारे लिए क्या किया है।

फिर उन्होंने एक दिन पूछा कि पिताजी, मुझे अपनी कैसी छवि दुनिया के सामने रखना चाहिए। उनके पिता ने कहा- बेटा, कभी भी किसी चीज को देखकर surprise मत होना। यही कारण था कि नरेंद्र ने सीखा कि सबकी respect करनी चाहिए। किसी को hurt नहीं करना चाहिए। जब वे एक monk (साधु) बन गए। तब चाहे, वह किसी राजा के महल में जाए या फिर किसी गरीब के घर में। वह उनके साथ हमेशा एक जैसा व्यवहार करते थे। उन्हें अमीर गरीब से, कोई भी फर्क नहीं पड़ता था। 

नरेंद्र जब छोटे थे। तब उन्हें एक दिन दो तरह के सपने आए। एक बहुत पढ़ा लिखा आदमी है। जिसके पास बहुत पैसा है। Society में उसका नाम, बहुत ऊंचा है। उसके पास एक बहुत सुंदर घर है। उसकी पत्नी और प्यारे-प्यारे बच्चे हैं। दूसरी तरफ एक monk हैं, जो एक जगह से दूसरी जगह घूमते रहते हैं। उन्हें simple life बहुत पसंद है। पैसा और दूसरी सुख सुविधाएं देने वाली चीजें, उन्हें खुश नहीं करती। उनकी तो बस यही इच्छा थी कि वह भगवान को जाने। उनके और पास चले जाएं। नरेंद्र जानते थे कि वह इनमें से कुछ भी बन सकते थे। उन्होंने बहुत गहराई से सोचा। उन्हें यह एहसास हुआ कि वह एक monk की तरह ही जीना चाहते थे।

स्वामी विवेकानंद : ईश्वर की खोंज
Swami Vivekananda in Search of God

 स्वामी विवेकानंद के पास, एक ही लक्ष्य था। उन्हें भगवान को देखना है। उन्हें अनुभव करना था। कि भगवान से मिलना कैसा लगता है। वह चाहते थे, कि कोई ऐसा  इंसान उन्हें रास्ता दिखाएं। जिन्होंने खुद भगवान को देखा हो। उन्होंने अपनी इस खोज में, ब्रह्म समाज को join किया। एक दिन उन्होंने, इस group के leader से पूछा। क्या आपने भगवान को देखा है। इनकी बात सुनकर, देवेंद्रनाथ बहुत surprise हो गए। उन्होंने नरेंद्र का मन बहलाने के लिए कहा। बेटे तुम एक साधु के जैसे हो। तुम्हें और ज्यादा meditation करना चाहिए। उनकी बात से नरेंद्र निराश हो गए। उन्हें लगा कि जैसा teacher वह चाहते हैं। वैसे वह नहीं है। उन्होंने बहुत सारे लोगों से पूछा, पता लगाया। लेकिन उन्हें जो चाहिए था। वह उन्हें नहीं मिल रहा था।

रामकृष्ण परमहंस से मुलाकात
Meeting to Ramkrishna Paramahamsa

  नरेंद्र दत्त ने रामकृष्ण के बारे में सुना।  जिनका मन इतना साफ था। जो इतनी गहराई से meditation करते थे। कि उन्होंने भगवान को महसूस किया था। नरेंद्र श्री रामकृष्ण से दक्षिणेश्वर मंदिर में मिले थे। वह नरेंद्र से मिलकर बहुत प्रभावित हुए। नरेंद्र ने उन्हें पूरे मन से भजन सुनाए। रामकृष्ण समझ गए कि यह दूसरे बच्चों से अलग हैं। रामकृष्ण इस बात से बहुत खुश थे। उन्हें एक ऐसा student मिला। जिसके साथ, वह अपने विचारों को share कर सकते थे। रामकृष्ण को छोड़कर, अब तक किसी भी टीचर ने नहीं कहा था। कि उन्होंने भगवान को देखा है।

अब नरेंद्र को विश्वास हो गया। कि वह जिसे खोज रहे थे। वह मिल गए। नरेंद्र ने एक बार पूछा- मास्टर जी, क्या आपने भगवान को देखा है। इस पर रामकृष्ण ने कहा- हां, मैंने भगवान को देखा है। जैसे मैं तुम्हें देख पा रहा हूं। वैसे ही मैं भगवान को भी देख सकता हूं। भगवान को देखा जा सकता है। उनसे बातें की जा सकती हैं। लोग अपनी family, पैसा, property के लिए रोते हैं। लेकिन भगवान की एक झलक देखने की इच्छा, किसी में नहीं है। कोई उन्हें देखने के लिए आंसू नहीं बहाता। अगर सच में, कोई उन्हें देखना चाहता है। तो वह उन्हें देख सकता है। यह सुनकर नरेंद्र के मन को, बहुत ज्यादा शांति मिली।

रामकृष्ण परमहंस की म्र्त्यु व नरेंद्र दत्त का संघर्ष
Death of Ramkrishna Paramahamsa and Struggle of Narendra Datta

16 अगस्त 1886 में रामकृष्ण परमहंस की, कैंसर से मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु के बाद, सारे monk बेघर हो गए थे। नरेंद्र दत्त 23 साल के हो चुके थे। अब उनकी responsibility थी। कि वह सभी monk का ध्यान रखें। उन्हें शिक्षा दें। रामकृष्ण के एक follower ने किराए पर, एक घर देने का offer दिया। यहीं से, बारानगर मठ की शुरुआत हुई। नरेंद्र पूरे मन से सभी नए monk को पढ़ाने में लग गए। वह अपने कर्तव्य का  निर्वहन, पूरी निष्ठा से करते।

रामकृष्ण के सारे monk को, उनकी सिखाई बातों ने उन्हें एक साथ जोड़ कर रखा हुआ था। सभी साधु की तरह जीवन व्यतीत करते थे। वह पूरा दिन पूजा, पढ़ाई, meditation और भजन गाने में बिता देते थे। नरेंद्र चाहते थे कि उनके सभी monk को, हर चीज के बारे में पूरी knowledge हो। वह उनके साथ बहुत सारी बातें शेयर  करते। उनकी knowledge को बढ़ाते रहते। दुनिया के अलग-अलग जगहों की books पढ़कर सुनाते थे।

नरेंद्र उन्हें दूसरी countries की history और political system के बारे में बताते थे। उन्हे कर्म, योग व भक्ति के बारे में बताते। इसी कारण उनकी knowledge, हर area में बहुत अच्छी हो गई थी। नरेंद्र चाहते थे कि सभी monk, independent बनना सीखें। इसीलिए वह भारत की यात्रा पर निकल पड़े। उनके पास सिर्फ एक डंडा और एक कटोरा था। बस वो ऐसे ही चलते रहे। आगे बढ़ते रहें। इसी ने उन्हें एक simple monk से स्वामी विवेकानंद बना दिया। जिन पर आज हिंदुओं को इतना गर्व है।

स्वामी विवेकानंद की भारत यात्राएं
Swami's Trips to India

  वह सबसे पहले वाराणसी गए। जिसे भारत की सबसे पवित्र जगह माना जाता है। यह वही जगह है, जहां बुद्ध और शंकराचार्य जैसे संतों को भगवान से ज्ञान मिला। नरेंद्र को यहां पर आकर बहुत अच्छा लगा। मानो जैसे उनमें एक नई energy भर गई हो। एक दिन, नरेंद्र वाराणसी में घूम रहे थे। तभी बंदरों की टोली ने, उन पर हमला कर दिया। नरेंद्र जितना तेज हो सकता था, भागने लगे। तभी वहां एक बूढ़े monk ने चिल्लाकर कहा- इनका सामना करो, इनका सामना करो। यह सुनकर नरेंद्र पीछे घूमे। पूरी हिम्मत करके, उन्होंने उन बंदरों को गुस्से से देखा। तभी सच में, बंदर डरकर भाग गए।

     स्वामी जी ने यही पाठ, दूसरों को भी सिखाया। कि जीवन में आने वाली problems का सामना करना सीखना चाहिए। वह हमें चाहे जितना डरा रही हो। लेकिन हमें उससे भागना नहीं चाहिए। बल्कि पूरी हिम्मत से, उनका सामना करना चाहिए । वाराणसी से नरेंद्र अयोध्या चले गए। जो भगवान राम का घर है। वहां से लखनऊ गए। जो मुस्लिम palaces और gardens के लिए बहुत प्रसिद्ध है। इसके बाद, उन्होंने ताजमहल देखा। जिसकी सुंदरता देखकर, उनकी आंखों में आंसू आ गए। फिर वह वृंदावन में, भगवान कृष्ण की कहानी से बहुत inspire हुए। इतना लंबा सफर, नरेंद्र ने नंगे पैर व बिना पैसों के तय किया।

   आगे कुछ समय तक वह नॉर्थ इंडिया में रहे। जो आर्यावर्त या आर्यन की पवित्र जगह थी। यही वह जगह है। जहां से India की spiritual tradition की शुरुआत हुई थी, हमें उपनिषद व वेद यही से मिले थे। Adventure ने उन्हें, North India से South India तक पहुँचा दिया था। रामेश्वरम में स्वामी जी की मुलाकात राजा रघुनाथ से हुई। वह भी उनके शिष्य बन गए। वह रामनाथ ही थे। जिन्होंने स्वामी जी को अमेरिका में शिकागो जाने के लिए कहा। ताकि वह parliament of religion में Hindu religion के बारे में सबको बता सकें। राजा ने सारा खर्च उठाने का वादा किया। पूरा भारत भ्रमण करके, वह और ज्यादा समझदार व जानकार हो गए थे। उन्हें भारत में रहने वाले लोगों की गरीबी और तकलीफ के बारे में भी पता चला। Caste system ने लोगों का जीना मुश्किल कर दिया था। 

उन्हें लगा कि भारत की गरीबी और तकलीफ को, Western countries के साथ share करना चाहिए। स्वामी जी को अमेरिका में,एक hope और opportunity  दिखाई दी। वहां कोई caste system नहीं था। Parliament of Religion एक बहुत ही अच्छा मौका था, भारत के लिए मदद मांगने का। स्वामी जी से, उन्हें भारत का ancient knowledge और ज्ञान मिल सकता था। बदले में भारत, उनसे modern technology के बारे में जान सकता था। हैदराबाद में, स्वामी जी ने पहली बार लोगों के सामने lecture दिया। जिसका नाम उन्होंने, “My mission to the West” रखा। बहुत सारे लोग उन्हें सुनने के लिए आते थे। उनकी समझ और knowledge से बहुत प्रभावित होते थे।

स्वामी जी की अमेरिका यात्रा व भाषण का सार
Summary of Swami Ji's Visit to America and Speech

 स्वामी जी समुद्री मार्ग से यात्रा कर रहे थे। उनकी मुलाकात कुछ intresting लोगों से हुई। उन्होंने हांगकांग और सिंगापुर के sea port देखें। वह चाइना और जापान के temple में भी गए। स्वामी जी ने शिकागो जाने के लिए Vancouver और Canada से train ली। अमेरिका के लोग स्वामी जी के गेरुए कपड़ों और पगड़ी को देखकर, हैरान थे। जब वह सड़को पर चलते थे। तो लोग उन्हें follow करने लगते थे।

  सितम्बर,1893 में parliament of religion खोला गया। यह एक मेले जैसा था। जब क्रिस्टोफर कोलंबस ने अमेरिका को खोजा था। तभी से इसे  celebrate किया जाने लगा। इसका उद्देश्य था, यह दिखाना कि western countries, Science और Technology में कितने आगे बढ़ गए है। चूँकि religion भी हमारी जिंदगी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसलिए उसे भी शामिल किया गया था। उस हाल में करीब 7000 लोग पूरी दुनिया से जमा थे। हर religion के प्रतिनिधि थे। यह religion थे- Islam, Christianity, Buddhism, Zoroastrianism, Jainism, Judaism, Confucianism, Hinduism । हर एक leader को सामने आकर speech देनी थी। स्वामी जी बहुत nervous थे। उन्होंने कोई speech नहीं लिखी थी।

    उनके बोलने की जब बारी आई। तो उनके पहले words थे। Brothers and sisters of America। जिसने वहां पर उपस्थित, सभी लोगों का दिल जीत लिया। उन्होंने खड़े होकर, उनके लिए तालियां बजाई। सबको लगा कि कोई अलग आया है। जिसने पूरे मन से ये कहा। जिनकी बातों में सच्चाई है। वो सबसे यह कहना चाहते थे। हमें एक-दूसरे को accept करना सीखना होगा। हमें एक-दूसरे को समझने की और शांति बनाए रखने की जरूरत है। कोई हमसे अलग है, तो क्या हुआ। हमें सब की respect करनी चाहिए। उन्होंने बताया कि कैसे भारत ने, पुराने समय में जोरास्ट्रियन और इजरायल के लोगों को सहारा दिया था। भारत में रहने की जगह दी थी।

    वह समझा रहे थे कि अलग-अलग religion के लोग छोटी-छोटी नदी की तरह है। जो अलग तो हो सकते हैं। लेकिन सब के सब अंत में समुद्र में जाकर मिल जाते हैं। एक हो जाते हैं। वह समुद्र है- भगवान। उन्होंने अपने religion के बारे में ही बात नहीं की। बल्कि दुनिया के सारे religion के बारे में बताया। उनकी यही बात और सोचने का तरीका, भीड़ में उन्हें सबसे अलग बनाता था। समय के साथ, दुनिया बहुत modern हो गई थी। इसी modern दुनिया से उन्होंने request की। हमें भेदभाव को खत्म करना होगा। हर जाति, रंग और caste को accept करना होगा। स्वामी जी ने कहा कि हम सब बिल्कुल एक जैसे हैं। इसलिए यह भेदभाव बंद होना चाहिए।

      स्वामी जी की वह खास बात, जो उन्हें दूसरों से अलग बनाती थी। वह यह थी कि उन्होंने कभी दूसरे religion की बुराई नहीं की। उन्होंने कभी भी एक religion को सही और बाकी सबको गलत नहीं ठहराया। उनका मानना था कि सब religion हमें भगवान तक ले जाने का रास्ता है। वो कहते थे कि किसी मकान के अंदर जाने के बहुत सारे दरवाजे हो सकते हैं। Parliament के आखिरी दिन उन्होंने कहा कि parliament of religion ने यह साबित कर दिया है।  हर religion दान करने, मदद करने में विश्वास करता है। उन्होंने कहा कि अगर एक भी ऐसा Religious Leader है। जो अपने religion को ऊपर रखकर, दूसरों को दबाना चाहता है। तो मुझे उस पर दया आती है।

उन्होंने कहा कि जल्द ही हर religion का एक ही slogan होगा- शांति और प्रेम। तोड़फोड़ और विनाश नहीं। एक रात में ही स्वामी जी जैसे एक celebrity बन गए थे। लोग उनकी बातों को और उनकी सच्चाई को बहुत पसंद करते थे। पूरे शिकागो में, स्वामी जी के बड़े-बड़े पोस्टर लगे थे। उनके फोटो के नीचे लिखा था- The Monk Vivekananda। जो भी उनकी फोटो के सामने से गुजरता था। वहां पर रुक कर, सिर झुका कर जाता था। स्वामी जी ने New York, Boston और Cambridge में lecture दिए। हर जगह उन्होंने, दया और सबको स्वीकार करने वाली सोच, को बढ़ाने की कोशिश की।

स्वामी जी की भारत वापसी
Swamiji's Return to India

    हजारों लोग port पर स्वामी जी के, वापस आने का इंतजार कर रहे थे। जब स्वामी जी की एक झलक दिखाई दी। तो वह सब बहुत खुश होकर, जमीन पर बैठ गए। स्वामी जी का Ceylon (Sri Lanka) के leader ने welcome किया। उनके लिए बड़ा जुलूस निकाला गया। एक Indian band ने, उनके लिए music बजाया। उनके ऊपर फूल बरसाए जा रहे थे। गुलाब जल और गंगाजल छिड़का जा रहा था। लोगों ने जो उनके लिए किया। उसे उन्होंने बड़े प्रेम से स्वीकार किया।

     उन्होंने हिंदुओं को भगवान पर विश्वास करने और उनकी भक्ति करने के लिए, बहुत तारीफ की। लोग उनको, उनके ज्ञान और सोच के लिए पसंद करते थे। वह इन सबके लिए grateful थे। स्वामी जी पहले मद्रास गए। फिर कोलकाता। वह जहां भी जाते, लोग उनका स्वागत करने के लिए, उनका इंतजार करते थे। लोगों में उन्हें देखने और उनकी बातें सुनने की बड़ी इच्छा थी। स्वामी जी ने नॉर्थ इंडिया के हर state में lecture दिया। वह अल्मोड़ा, जम्मू, लाहौर और भी बहुत सी जगह गए। सब जगह उन्होंने इसी बात पर जोर दिया। हर एक को खुद को एक अच्छा इंसान बनाना होगा। एक-एक करके सब अच्छे होते जाएंगे। तो पूरा देश और strong बन जाएगा। 

उन्होंने कहा, आप जिंदगी के किसी भी रास्ते पर चलें। लेकिन खुद को एक अच्छा इंसान बनाएं। सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है, अपने अंदर प्यार, respect, हिम्मत और दूसरों की मदद करने की भावना, जैसी  qualities को develop करना। क्योंकि यह आपको बहुत strong बना देता है। उन्होंने लोगों को संस्कृत भाषा को promote करने के लिए भी कहा। ताकि कहीं हिंदू religion खत्म ना हो जाए। स्वामी जी एकता को बढ़ावा देने के लिए, एक caste की दूसरे caste में शादी करने की बात भी करते थे।

रामकृष्ण मिशन की स्थापना
Establishment of Ramakrishna Mission

स्वामी जी के western दोस्तों ने, एक नए मठ को बनाने में, उनकी मदद की। जिसका नाम बेलूर मठ रखा गया। यह रामकृष्ण के followers के लिए एक headquarter बन गया। हर रोज स्वामी जी से यहां लोग मिलने आते। उन्हें हजारों खत भी आते थे।  लोग भगवान को पाने में, उनकी मदद लेना चाहते थे। उनसे सीखना चाहते थे। अंत में स्वामी जी बेलूर मठ में रहने लगे।

      उनका अस्थमा और खराब होता जा रहा था। डॉक्टर ने उन्हें सब काम छोड़ कर, retire होने के लिए कहा। इसीलिए स्वामी जी, अब ज्यादा समय मठ के अंदर ही रहते थे। कभी-कभी वह walk करने निकलते थे। कभी kitchen में जाकर देखते कि सब काम ठीक से चल रहा है। कभी monk के साथ भजन गाने लगते थे। स्वामी जी ने study करना जारी रखा। खुद को उसमें busy कर लिया। दिन प्रतिदिन उनका शरीर कमजोर होता जा रहा था। लेकिन उनका दिमाग, अभी भी बहुत कुशाग्र था।

स्वामी जी को Encyclopedia britannica बहुत पसंद आई। एक monk ने कहा कि इस किताब के सारे 25 वॉल्यूम को याद करना, बहुत मुश्किल है। पर स्वामी जी, तब तक 11वँ  वॉल्यूम शुरू कर चुके थे। उन्होंने monk से कहा कि वह जो 10 volume पढ़ चुके हैं। उनमें से वह कुछ भी पूछ सकता है। वह monk बहुत आश्चर्यचकित था कि स्वामी जी को सारे जवाब आते थे।

स्वामी विवेकानंद की म्र्त्यु
Death of Swami Vivekananda

  स्वामी जी को महसूस हो गया था। वह 40 की उम्र तक नहीं पहुंच पाएंगे। उनकी उम्र, उस समय 39 साल 5 महीने हो चुकी थी। उन्होंने पंचांग में, यह calculate करने के लिए देखा कि उनकी मृत्यु कब होने वाली है। स्वामी जी ने अपने सीनियर monk को बता दिया था कि वह अपना अंतिम संस्कार कहां चाहते है। वह उसी मठ के ग्राउंड में एक जगह थी।

   शुक्रवार शाम 7:00 बजे घंटी बजी। पूजा का समय हो गया था। स्वामी जी अपने कमरे में पूजा और मेडिटेशन करने चले गए। उन्होंने अपने सेवक से कहा कि वह एक घंटे, अपने कमरे में रहेंगे। उन्हें कोई disturb ना करें। उसके बाद स्वामी जी ने, अपने सेवक को मदद के लिए बुलाया। सभी खिड़की व दरवाजों को खोला गया। ताकि शुद्ध हवा आ सके। स्वामी जी बिस्तर पर लेट गए। उनके सेवक ने सोचा कि वह सो गए हैं। वह वैसे ही लेटे रहे और उनके चेहरे पर बहुत शांति थी। वह लंबी सांसे ले रहे थे। फिर उनके हाथ कांपने लगे। उनके नाक, आंख और मुंह से blood निकलने लगा।

     योग पुस्तकों में बताया गया है कि एक महान और पवित्र संत की आत्मा सिर से बाहर निकलती है। जिसकी वजह से bleeding होती है। यह घटना रात 9:00 बजे हुई। डॉक्टरों ने इसका कारण apoplexy यानि अचानक सुनना बंद हो जाना बताया। लेकिन दूसरे monk समझ गए थे कि स्वामी जी ने जानबूझकर समाधि ले ली है। उन्होंने उनके शरीर को गेरुआ कपड़ा उड़ा दिया। चारों तरफ फूल बिछा दिए गए। उनका अंतिम संस्कार, अगले दिन उसी स्थान पर किया गया।

     सभी monk को स्वामी जी की कही हुई बात याद आ रही थी। एक समय आएगा, जब मैं अपने शरीर को, एक पहने हुए कपड़े की तरह त्याग दूंगा। मगर यह मुझे काम करने से रोक नहीं पाएगा। मैं हमेशा लोगों को inspire करता रहूंगा। जब तक वह समझ नहीं जाते कि वह उस भगवान का ही एक part हैं। हो सकता है कि मैं बार-बार जन्म लूं।

 

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