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Inner Engineering Book Summary in Hindi | ख़ुद अपना भाग्य लिखें

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Inner Engineering Book By Sadhguru
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Inner Engineering By Sadhguru Book Summary in Hindi
आनंदमय जीवन के कुछ सूत्र

  हमें इनर इंजीनियरिंग की क्यों जरूरत है। सद्गुरु जग्गी वासुदेव जी हमें बताते हैं। आज जो हमारी उपजीविका की प्रक्रिया है। वह पहले से कहीं अधिक बेहतर है। आज हम साल भर की चीजें, सुपरमार्केट्स खरीद सकते हैं। वह भी बिना घर से बाहर निकले।  पहले राजा-महाराजाओं के लिए, जो चीज दुर्लभ थी। आज वो आम इंसान के हाथ में है। लेकिन उसके साथ, हमने बहुत सारी जटिलताएं create कर ली है।

      बहुत सारा तनाव, हमने create कर लिया है। क्योंकि हजारों साल पहले, हमारे पूर्वज इतने खुश थे। जितने आज हम नहीं है। हजारों सालों से, हमारी यह समझ है। अगर हमने बाहर की स्थितियों को ठीक कर लिया। तो हमारे अंदर की स्थिति ठीक हो tuजाएगी। लेकिन सद्गुरु कहते हैं। जो तरीका हजारों सालों से, कारगर सिद्ध नहीं हुआ। वह आगे कैसे कारगर सिद्ध हो सकता है।

     अब समय आ गया है। अंदर की स्थिति को ठीक करने का यानी इनर इंजीनियरिंग का। वह कहते हैं कि इसके लिए हमें सिर्फ़ एक काम करना है। अपने direction में थोड़ा-सा changes लाना है। हमें यह समझना है। कि हमारे सारे अनुभव का आधार व स्रोत जो है। वह हमारे अंदर ही होता है। अगर आप अंदर से सुखी हो जाते हो। तो इसे आनंद और शांति कहते हैं।

     अगर आपके आसपास का वातावरण सुखी हो जाता है। तो उसे सफलता कहते हैं। लेकिन सफलता हासिल करने के लिए, खुश होना बहुत जरूरी है। मनोवैज्ञानिक आधार पर, अगर हम अंदर से खुश हो जाते हैं। तो हमारी क्षमताएं कई गुना बढ़ जाती है। अगर हमें भोजन का आनंद लेना है। तो हमें अंदर से खुश होना होगा। अगर आपको अपने परिवार और परिजनों का आनंद लेना है। तो पहले आपको अंदर से खुश होना होगा।

    खुशियां ही कोई अंतिम उद्देश नहीं होता है। अंतिम लक्ष्य नही होता है। यह तो हर काम को शुरुआत करने से पहले अनिवार्य होता है। लेकिन आज खुशहाल रहना, हमारे लिए चुनौती बन गया है। अंदर की स्थिति को ठीक करने के लिए, अंदर से खुश होने के लिए। हमने बाहर की चीजों को तहस-नहस करना शुरु कर दिया। अगर ऐसा ही चलता रहा। तो पूरी पृथ्वी नष्ट हो जाएगी।

      लेकिन हम कभी भी अंदर से ठीक नहीं  होंगे। अंदर से हम खुश नहीं होने वाले हैं। क्योंकि जो भी हम feel करते हैं। वह हम अपने अंदर ही feel करते हैं। जो भी हम देखते हैं। वह अपने अंदर ही देखते है। जब हम कोई किताब देखते हैं। तो क्या उसकी image बाहर create होती है। उसकी image तो हमारा अंदर ही create होती है। Light उस किताब गिरती है। वह हमारे आंखों की पुतली तक पहुंचती है।

     हमारे आंखों का retina, उसकी उल्टी image बनाता है। मतलब हम किताब को, अपने अंदर की देखते हैं। हर चीज को हम अपने अंदर ही देखते हैं। चाहे वो अंधेरा या उजाला हो। चाहे वो दुख हो या सुख हो। हर एक का एहसास, हमारे अंदर ही होता है। अगर हमें हर image अंदर बहुत अच्छी create करनी है। तो हमें इनर इंजीनियरिंग सीखना होगा। इसे समझना होगा।

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ज़िम्मेदारी की स्वतन्त्रता को समझे

 आज आपको यह एहसास करना होगा। आप जो कुछ भी हो और जो कुछ नहीं हो। वह सिर्फ आप अपनी वजह से ही हो। हम ही अपनी जिंदगी के creater होते हैं। इसलिए सबसे पहले तो हमें इसकी जिम्मेदारी लेनी होगी। अपनी life की। तो आपको ऐसा क्यों करना है। क्योंकि जब आप जिम्मेदारी लेते हो। तो आपके पास स्वतंत्रता आती है। उस परिस्थिति से निपटने के लिए, बहुत सारे option आपके पास आ जाते हैं।

     अगर हम जिम्मेदारी नहीं लेते हैं। तो हमारे पास कोई option नहीं बचता है। सिवाय दूसरों को दोष देने के या फिर गुस्सा करने के। जब हम गुस्सा करते हैं। तो हम अपने शरीर मे विष पैदा करते है। हमारा शरीर पूरी तरीके से विषैला हो जाता है। हम गुस्सा इसलिए करते हैं। क्योंकि हम मानते हैं कि हमारा मन जो disturb हुआ है। वो किसी और की वजह से हुआ है। फिर हम दूसरों को सुधारने के चक्कर में लग जाते है।

     दूसरे कभी सुधारते नहीं है। क्योंकि वो हमारे कंट्रोल में, नहीं होते है। लेकिन हमारी मन: स्थिति ही हमारे कंट्रोल में होती है। इसलिए हमे सबसे पहले,जिम्मेदारी की स्वतंत्रता को समझना होगा। अगर हम हमारी जिंदगी की जिम्मेदारी लेते हैं। तो हम स्वतंत्रता का अनुभव करते हैं। फिर बहुत सारे option हमें मिल जाते हैं। उस particular situation से बाहर आने के लिए।

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योग विज्ञान को समझिए

  हमें योग विज्ञान को समझना होगा। क्योंकि हमारी क्षमताये असीमित होती है। यह हमें योग विज्ञान सिखाता है। योग हमारे अंदर की स्थिति को वैसा ही रखता है। जैसा हम उसे रखना चाहते हैं। जब अंदर की स्थिति में, तालमेल आ जाता है। तो हर चीज बहुत खूबसूरत तरीके से, काम करने लगती है। तब हमारी सर्वोत्तम क्षमताये प्रकट होने लगती है। सद्गुरु कहते हैं कि कुछ धार्मिक पुरखों ने, इंसान से जुड़ी हर खूबसूरत चीज को, दूसरे लोक में रख दिया है।

      अगर आप आनंद की बात करेंगे। तो वह अलौकिक आनंद की बात करेंगे। अगर आप शांति की बात करेंगे। तो वह दिव्य शांति की बात करेंगे। अगर आप प्रेम की बात करेंगे। तो वह ईश्वरी प्रेम की बात करेंगे। अगर हमें यह सारे एहसास करने हैं। तो हमे उसके लिए, दूसरे लोक में जाना पड़ेगा। स्वर्ग में ही जाना पड़ेगा। इंसान के इस जन्म में, तो यह possible नहीं है। 

    लेकिन सतगुरु कहते हैं। यह सब हमारे मानवीय गुण है। हम इंसान रहते हुए ही, यह सारी प्रेम, शांति और आनंद महसूस कर सकते हैं। ज्यादातर ईश्वर और स्वर्ग की बाते इसलिए होती है। क्योंकि हम मनुष्य होने की विशालता को भूल गए है। योग हमें  महामानव नहीं बनाता है। वह सिर्फ हमें ये एहसास कराता है। मानव होना ही, अपने आपमें महान है। योग विज्ञान के अनुसार, हमारे पांच शरीर होते हैं।

Physical Body – मतलब जो भोजन हम ग्रहण करते हैं। उससे जो शरीर बनता है। उसे अन्नमयी कोश कहते है।

Mental Body – इसे मनोमयी कोश यानिकि मानसिक शरीर कहते है। इस मानसिक शरीर में, जो भी negative विचार आते हैं। उसकी वजह से ही, Psychosomatic Disorder होता है। मतलब इसका असर, हमारे भौतिक शरीर पर भी आता है। मनोमय कोश व अन्नमय कोश दोनों एक-दूसरे से, जुड़े हुए है। क्योंकि हमारा दिमाग सिर्फ मस्तिष्क में ही नहीं होता है। अगर वह सिर्फ़ मस्तिष्क में होता। तो बीमारियां सिर्फ मस्तिष्क में ही आती। 

       लेकिन हमारे शरीर की हर कोशिका की अपनी बुद्धिमता होती है। यह पूरी तरीके से एक मानसिक शरीर होता है। इसलिए मानसिक काया में, जो बदलाव होता है। उसका असर शारीरिक काया पर होता है। शारीरिक काया में जो बदलाव होता है। उसका असर हमारी मानसिक काया पर होता है। हमारा भौतिक शरीर अगर hardware है। तो मानसिक शरीर software होता है। 

Energy Body – इसे प्राणमयी कोश यानिकि ऊर्जा शरीर भी कहते हैं। ऊर्जा शरीर हमारे hardware व software में ऊर्जा प्रवाहित करने का काम करता है। अगर ऊर्जा शरीर, हमारा संतुलित रहता है। तो हमारे मानसिक शरीर व भौतिक शरीर में, कोई भी बीमारियां नहीं आती है।

Wisdom Body – इसे ज्ञानमयी शरीर भी कहते है। ज्ञान का मतलब, जानकारी होता है। तो विशेष ज्ञान का मतलब, असाधारण जानकारी होता है। हमारे शरीर का यह जो आयाम है। उसमें असाधारण जानकारी होती है। यह पांच इंद्रियों से परे होता है।

Blissful Body – इसे आनंदमयी कोश कहते हैं। यह पूरी तरीके से अभौतिक होता है। शरीर के इस आयाम को, अगर हम स्पर्श करते हैं। तो हम पूरी तरीके से, आनंदमय हो जाते हैं। इसमें समय और स्थान की सीमाएं खत्म हो जाती है। कई ऐसे योगियों की कहानियां है। जो बहुत समय तक, एक ही जगह पर बैठकर, ध्यान धारणा करते थे।

     यह कैसे possible होता था कि एक ही जगह पर, लंबे समय तक ध्यान कर पाना। उन्होंने शरीर के इस आयाम को, स्पर्श कर लिया होता था। इसलिए उनके लिए समय और स्थान की सीमा, पूरी तरीके से खत्म हो चुकी होती थी। अगर हमारा भौतिक, मानसिक और उर्जा शरीर संतुलित हो जाता है। तो हम इस आयाम में प्रवेश कर लेते हैं। योग और साधना के द्वारा, हम भौतिक, मानसिक और ऊर्जा शरीर में संतुलन create कर सकते हैं।

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क्या हमारा शरीर एक अद्भुत मशीन है

 वास्तव में, हमारा शरीर इस दुनिया की अद्भुत मशीन है। दुनिया की सारी मशीनें इसी मशीन से निकली हैं। लेकिन क्या हम इसकी क्षमताओ का पूरी तरीके से इस्तेमाल करते हैं। सतगुरु कहते हैं कि हम अपने शरीर की क्षमताओ का 1% भी इस्तेमाल नहीं करते हैं। सिर्फ जिंदा रहने के लिए और जिंदगी को चलाने के लिए, हमारे शरीर की क्षमता का 1% से भी कम की जरूरत पड़ती है।

     हम हमारे शरीर से, बहुत ही मामूली काम कर रहे हैं। ऐसा इसलिए हो रहा है। क्योंकि  हमारा जो बौद्धिक स्तर है। वो भौतिक लेवल तक ही सीमित है। योग हमें सिखाता है कि हमारे शरीर की, जो पांच इंद्रियां है। उसके परे, हम इसकी क्षमताओं का कैसे इस्तेमाल करें। क्योंकि हमारा जो शरीर है। वह पूरे ब्रमांड को download करने की छमता रखता है। हम अगर अपने शरीर को सही स्थिति में रखते हैं। तो ब्रमांड  के बारे में पूरी जानकारी हासिल कर सकते हैं। इस बात को समझाने के लिए, सद्गुरु अपने जीवन का एक example देते हैं।

     सतगुरु जी कुछ साल तक, एक फॉर्म हाउस में रहते थे। पास के एक गांव में, एक व्यक्ति रहता था। जोकि न के बराबर सुनता था। लोग उसे मुर्ख ही समझते थे। क्योंकि वह किसी की बातों का जवाब नहीं देता था। सतगुरु ने उस व्यक्ति को काम पर रख लिया। एक दिन वह व्यक्ति सुबह 4:00 बजे खेत जोतने लग गया। सद्गुरु ने पूछा कि आप यह क्या कर रहे हो। क्योंकि बारिश तो नहीं हुई है। ऊपर आसमान जी बिल्कुल साफ है। बारिश होने की कोई संभावना भी नहीं है।

    इसके बाद भी, आप खेत क्यों जोत रहे हो। उस व्यक्ति ने बहुत confidence के साथ कहा। कि स्वामी जी आज बारिश होने वाली है। सचमुच उस दिन बारिश हुई। सतगुरु को बहुत आश्चर्य हुआ। वह सोचने लगे कि जो बात इस व्यक्ति को समझ में आई। वह मुझे क्यों समझ में नही आई। उन्होंने इधर-उधर हाथ घुमाकर, नमी और तापमान का अंदाजा लेने की कोशिश की। आसमान को पढ़ने की कोशिश की।

      मौसम से संबंधित, बहुत सारी किताबे उन्होंने पढ़ी। लेकिन इसका जवाब उन्हें नहीं मिला। लेकिन continuously उस दिशा में  प्रयास करते रहने से। 18 महीने बाद, उन्हें इसमें महारत हासिल हुई। सद्गुरु कहते हैं कि अगर मैं बोलूं। आज बारिश होने वाली है। तो इसकी संभावनाएं 95% होती है। यह कोई जादू या ज्योतिष नहीं है। हमारा शरीर जो पांच तत्वों से बना है। वह हमें ये information देते है। हमारे आसपास के वातावरण में, क्या बदलाव होने वाला है। इसके लिए सतगुरु जी एक बहुत खूबसूरत साधना बताते हैं।

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साँसो से संबन्धित साधना

सतगुरु जी कहते हैं कि आपको क्या करना है। हर रोज 5 मिनट, आपको meditation की अवस्था में बैठना है। आंखें बंद करना है। सांसो को स्थिर होने देना है। आप पाओगे कि धीरे-धीरे आपकी सांसें स्थिर हो रही है। क्या मतलब है सांसो के स्थिर होने का। सतगुरु बताते हैं कि एक आम इंसान, एक मिनट में 12 से 15 बार साँसे लेता है।

   अगर यह सांसें 12 पर स्थिर हो जाती है। तो आपके वातावरण में, क्या बदलाव होने वाला है। इसके प्रति आप ग्रहणशील हो जाते हो। आपको समझ में आने लगता है। आपके आसपास के वातावरण में क्या बदलाव होने जा रहा है। अगर यह सांसें 9 पर स्थिर हो जाती है। तो आप प्राणियों की भाषा समझने लग जाते हो। अगर यह सांसें 6 पर स्थिर हो जाती है। तो आप इस पृथ्वी के बदलाव के प्रति संवेदनशील हो जाते हो।

      वही अगर यह सांसें 3 पर स्थिर हो जाती है। तो सद्गुरु कहते हैं कि आप सृष्टि  के कृपा के, प्रति पूरी तौर पर ग्रहणशील हो जाते हो। लेकिन एक बात, हमें यहां पर ध्यान में रखनी है। हमें अपनी सांसो को न तो जबरदस्ती बढ़ाना है। और न ही उसे जबरदस्ती कम करना है। बस आपको practice करते रहना है। धीरे-धीरे हमारी सांसें स्थिर होने लगती हैं।

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कौन-सा भोजन ठीक है - माँसाहार या शाकाहार

 इन सबके साथ, आपको अपने शरीर की क्षमताओ को बढ़ाने के लिए, भोजन की तरफ भी ध्यान देना होगा। हमारे लिए शाकाहार या मांसाहार कौन-सा भोजन ठीक है। सतगुरु जी कहते हैं। हमें इस बहस में पड़ना ही नहीं चाहिए। यह बात हमारा शरीर ही हमें बताता है। उसके लिए किस प्रकार का भोजन सही है। जिस प्रकार के भोजन से, आपको बहुत energetic महसूस होता है। उसी भोजन को आपको ग्रहण करना चाहिए।

      एक तथ्य आपको समझना है। अगर आप कच्चा माँस खाते हो। तो उसे हमारे system से बाहर आने के लिए, 70 से 72 घंटे लगते हैं। यह हमारे शरीर में 70 से 72 घंटे तक रहता है। अगर आप पका हुआ माँस खाते हो। तो इसके लिए 50 से 52  घंटे लगते हैं। अगर आप पकी हुई सब्जी खाते हो। तो उसके लिए 24 से 28 घंटे लगते हैं। अगर आप कच्ची सब्जी खाते हो। तो उसके लिए 12 से 15 घंटे लगते हैं।

      वही अगर आप फलाहार करते हो। तो उसके लिए 3/2 से 3 घंटे लगते हैं। आपके काम का स्वरूप कैसा है। आपकी तासीर कैसी है। उसके हिसाब से, आपको अपना भोजन चुनना है। इसके साथ-साथ सतगुरु जी कहते हैं कि आपको अपने पाचन तंत्र को भी समझना है। जो भोजन हम ग्रहण करते हैं। उसके हिसाब से हमारा शरीर छार या अम्ल produce करता है। 

       लेकिन अगर आप, एक साथ कई प्रकार के भोजन खा रहे हो। तो हमारा शरीर confuse हो जाता है। तब वह एक साथ, अम्ल व छार produce करता है। जो खाना हमने ग्रहण किया है। वह काफी देर तक, हमारे पेट में ही रहता है। वह जल्दी से बाहर नहीं आता है। वह पर वह सड़ने लगता है।

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उपवास का हमारे शरीर के लिए महत्व

 सद्गुरु कहते हैं कि हमारे शरीर का जो चक्र है। वह 48 से 40 दिनों में पूरा होता है। इस चक्कर में 3 दिन ऐसे होते हैं। जिसमें हमारे शरीर को, भोजन की जरूरत नहीं पड़ती है। मतलब वो जो तीन दिन है। आप बिना भोजन के भी रह सकते हैं। क्योंकि वह हमारे शरीर की सफाई का समय भी होता है। लेकिन यह 48 से 40 दिन में, वह 3 दिन कौन-कौन से हैं। जहां पर हमें खाना खाने की जरुरत नहीं पड़ती है।

     यह हमें समझ में कैसे आएगा। क्योंकि हम अपने शरीर के प्रति ज्यादा संवेदनशील नहीं रहते हैं। इसलिए हमें पता नहीं चलता है कि कौन-से ऐसे दिन है। जिस दिन हमें खाना खाने की जरुरत न पड़े। इसलिए हमारे ऋषि-मुनियों ने, एकादशी को उपवास का दिन रखा है। आप उस दिन उपवास कर सकते हो। वो हमारे भारतीय पंचांग के अनुसार, चंद्रमास के 11वें दिन आता है।

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मन का महत्व

  इनर इंजीनियरिंग के लिए, हमें अपने मन को भी समझना होगा। सतगुरु जी हमसे पूछते हैं कि आप जिंदगी को जीने वाले व्यक्ति बनना चाहते हो। या फिर जिंदगी के बारे में, सोचने वाले व्यक्ति  बनना चाहते हो। क्योंकि ज्यादातर लोग, अपनी जिंदगी 90% जो हिस्सा है। वो जिंदगी के बारे में, सोचने लगा देते हैं। आपको ज्ञात है कि हमारी पृथ्वी समय से घूम रही है। यह कोई साधारण बात नहीं है। ये बहुत अलौकिक घटना है।

      सारी आकाश गंगा समय से चल रही है। पूरा ब्रमांड बहुत perfect तरीके से काम कर रहा है। लेकिन हमारे दिमाग में, एक छोटा-सा, घटिया-सा विचार आता है। फिर हमारा पूरा दिन खराब कर देता है। ऐसा क्यों होता है। क्योंकि हमारी बुद्धि किसी particular चीज से, अपनी पहचान जोड़ लेती है। जिससे भी हम पहचान जोड़ लेते हैं। उसी के हिसाब से, हमें विचार भी आते हैं। 

    अगर हम मान लेते है कि हम एक इंसान है। तो उसी प्रकार के विचार हमें आएंगे। उसी प्रकार की भावनाएं महसूस करेंगे। अगर हम अपने आप को, किसी राष्ट्र या धर्म के साथ जोड़ लेते हैं। तो हमारा मन उसी दायरे में काम करता है। उसी प्रकार के विचार, हमें आने शुरू जाते हैं। लेकिन जब मृत्यु आती है। तो हमारी ये सारी पहचान खत्म हो जाती है। सतगुरु कहते हैं। अगर आप मृत्यु आने से पहले सजग हो गए। तो ये सारी परेशानियां, हमें जीवन में दुबारा कभी नहीं होगी।

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अध्यात्म के अनुसार, मानव मन के प्रकार

  हमारा मन पांच स्थितियों में रह सकता है। उसकी पहली स्थिति निष्क्रिय मन होती है। यह मन ज्यादातर सक्रिय नहीं होता है। ये इंसानो से कम, लेकिन प्राणियों के ज्यादा निकट होता है। अगर आप इसे और ऊर्जावान बनाते हो। तो यह सक्रिय मन बनता है। मतलब यह बहुत सारी जगहों पर भटकता है। जो लोग अपने आध्यात्मिक अभ्यास की शुरुआत करते हैं। तो शुरू में उनका मन सक्रिय होने लगता है। यह बहुत सारी जगहों पर, भटकने लगता है।

      अगर वो सही मार्गदर्शन में अभ्यास नहीं करते हैं। तो बहुत सारे लोग, इस भटकाव से थक जाते हैं। मन की सक्रियता से, डर जाते हैं। अपना अभ्यास बीच में ही रोक देते हैं। अगर आप इसे और ऊर्जावान करते हो। तो हमारा डॉवाडोल होने लगता है। मतलब यह सक्रियता से धीरे-धीरे स्थिर होने लगता है। यानि डॉवाडोल होने लगता है। कभी इधर, तो कभी उधर। लेकिन यह सक्रियता से काफी बेहतर होता है। पहले हम 10 जगह पर भटकते थे। अब इसका भटकाव कम हो जाता है।

      अगर इसे आप और ऊर्जावान करते हो। तो यह मन लक्ष्य केंद्रित हो जाता है। फिर पूरी तरह से, यह एक ही लक्ष्य पर ध्यान देंना शुरू कर देता है। अगर आप इसे और ऊर्जावान करते हो। तो यह सचेतन मन बन जाता है। हमारा मन जब सचेतन बन जाता है। तो यह कल्पव्रक्ष बन जाता है। ये जादू बन जाता है। ये चमत्कार बन जाता है। आप इससे, जो भी मांग करते हो। उसे वह साकार कर देता है। जब आपका मन स्थिर होने लगता है। तो आपको शरीर भी स्थिर होने लगता है। आपकी भावना भी स्थिर होने लगती है।

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