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Aryabhatta Most Inspirational Biography | आचार्य आर्यभट्ट- एक महान गणितज्ञ व खगोल शास्त्री

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Great Mathematician Aryabhatta
Biography in Hindi

  यह कोई 50 साल पहले की बात है। जब भारत ने पहली बार अंतरिक्ष में प्रवेश किया। 19 अप्रैल 1975 वह दिन, जब भारत ने अपने पहले उपग्रह का प्रक्षेपण किया। यह भारत के लिए, बड़े गौरव का क्षण था। जो इस बात का प्रमाण था कि भारत आधुनिक हो चला है। लेकिन इस ग्रह को डेढ़ हजार साल से भी पुराना नाम दिया गया- आर्यभट्ट।

       आर्यभट्ट का नाम पश्चिमी जगत में ऐसे मशहूर नहीं था। लेकिन भारत में आर्यभट्ट, एक उपग्रह मात्र नहीं था। वह दरअसल वैज्ञानिक प्रेरणा का दूसरा नाम था।

     वह आर्यभट्ट, जिसने पांचवी सदी में गणितीय और खगोलीय ज्ञान को। पहली बार चरणबद्ध तरीके से, किसी एक जगह एकत्रित किया। वह भी केवल 23 साल की उम्र में। उनके विचारों का अरबी में अनुवाद किया गया। जिन्होंने इस्लामी खगोल वैज्ञानियों और गणितज्ञों को खासा प्रभावित किया।

      हालांकि पश्चिमी जगत के समकालीन गणितज्ञों से आर्यभट्ट का कोई भी संपर्क नहीं था। यही वजह थी कि आर्यभट्ट के विचार वैश्विक स्तर पर, वैज्ञानिक खोजों में सीधे तौर पर योगदान नहीं दे पाए। धीरे-धीरे भारतीय जनमानस ने भी उन्हें भुला दिया। लेकिन जब आधुनिक भारत ने विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में, अपने नन्हे कदम बढ़ाने शुरू किए। तब आर्यभट्ट के नाम को दोबारा प्रतिष्ठा हासिल हुई।

 

Great Mathematician Aryabhatt
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Aryabhatt - An Introduction
आर्यभट्ट - एक परिचय

 

आर्यभट्ट – एक नजर में

नाम

आर्यभट्ट

जन्म

दिसंबर 476 ईसवी

जन्म स्थान

अश्मक, महाराष्ट्र

कुसुमपुर, पटना

(कुछ इतिहासकारों के अनुसार) 

युग

गुप्त काल

मुख्य रुचि

गणित व खगोल शास्त्र

कार्यस्थल

नालंदा विश्वविद्यालय

कार्यक्षेत्र

गणितज्ञ, ज्योतिषविद एवं खगोल शास्त्री

मुख्य रचनाएं

आर्यभट्ट सिद्धांत, दशगीतिका, तंत्र व आर्यभटीय

महत्वपूर्ण योगदान

पाई व शून्य की खोज

मृत्यु

दिसंबर 550 ईसवी

   प्राचीन भारत में अनेक महान वैज्ञानिक और चिंतक हुए। जिन्होंने ज्ञान के नए सूत्रों की रचना की। ब्रह्मांड के अनेक रहस्यों से पर्दा उठाया। सन 476 ईसवी में जन्में आर्यभट्ट भी, ऐसे ही एक स्वतंत्र चिंतक, प्रखर वैज्ञानिक एवं मेधावी गणितज्ञ थे। आर्यभट्ट ने प्रयोगों द्वारा सिद्ध किया कि पृथ्वी घूमती है और सूर्य स्थिर है। इसी बात को, उनके लगभग 1000 वर्ष बाद, महान वैज्ञानिक निकोलस कोपरनिकस ने भी कहा था।

Early Life of Aryabhatt
आर्यभट्ट का प्रारंभिक जीवन

आर्यभट्ट का जन्म 476 ईसवी अर्थात विक्रम संवत 533 में हुआ था। इस समय को  भारत का स्वर्णिम युग कहा जाता था। मगध शासक गुप्त साम्राज्य के काल में, समूचा भारत प्रगति की ओर अग्रसर था। यह सम्राट विक्रमादित्य ।। के समय में हुए थे। 

    आर्यभट्ट का जन्म स्थान वर्तमान पटना अर्थात प्राचीन कालीन मगध की राजधानी पाटलिपुत्र के निकट स्थित कुसुमपुर नामक गांव में हुआ था। लेकिन कुछ इतिहासकार उनके जन्म स्थान में मतभेद रखते हैं। उनका मानना है कि आर्यभट्ट का जन्म अस्मक, महाराष्ट्र में हुआ था।

    आर्यभट्ट अपने जीवन के किसी काल में, उच्च शिक्षा के लिए कुसुमपुर गए थे। वह कुछ समय वहां पर रहे भी थे। सातवीं शताब्दी के महान गणितज्ञ भास्कराचार्य ने, कुसुमपुरा की पहचान पाटलिपुत्र के रूप में की । जो कि आधुनिक समय में पटना के नाम से जाना जाता है।

       यहां पर अध्ययन का एक महान केंद्र नालंदा विश्वविद्यालय स्थापित था। संभव है कि आर्यभट्ट इससे जुड़े रहे होंगे। यह भी संभव है कि गुप्त साम्राज्य के अंतिम दिनों में आर्यभट्ट, वहां रहा करते थे। गुप्त काल को भारत के स्वर्णिम युग के रूप में जाना जाता है। बिहार में पटना का प्राचीन नाम कुसुमपुर था। जहां आज आर्यभट्ट का जन्म हुआ, वह दक्षिण में भी था।

    इनके शिष्य प्रसिद्व खगोलविद वराहमिहिर थे। आर्यभट्ट ने नालंदा विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त कर, मात्र 23 वर्ष की आयु में, आर्यभटीय नामक एक ग्रंथ लिखा था। उनके इस ग्रंथ की प्रसिद्धि और स्वीकृति के चलते। राजा बुध गुप्त ने उन्हें नालंदा विश्वविद्यालय का प्रमुख बना दिया था। 

इनके बाद 875 ईसवी में, आर्यभट्ट द्वितीय हुए। जिन्हें लघु आर्यभट्ट भी कहा जाता था। जो ज्योतिष और गणित विषयों मे पारंगत व उस समय के प्रसिद्ध आचार्य थे। आर्यभट्ट द्वितीय ने आगे चलकर ज्योतिष विज्ञान पर, महा सिद्धांत नाम का एक ग्रंथ भी लिखा।

Contribution of Aryabhatt
आर्यभट्ट का योगदान

  खगोल शास्त्र के बारे में, कोई भी ज्ञान। हम कोपरनिकस और गैलीलियो से जुड़ा हुआ मानते हैं। कोपरनिकस के ज्ञान के आधार पर हम पढ़ते हैं कि पृथ्वी, सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती है। पृथ्वी अपनी धुरी पर भी घूमती है। सूर्य के चारों तरफ भी घूमती है। लेकिन वास्तविकता यह है कि कॉपरनिकस और गैलीलियो से हजारों साल पहले । यह सारी knowledge आर्यभट्ट ने हमें दे दी थी।

  आर्यभट्ट ने सबसे पहले दुनिया को बताया कि इस सौरमंडल में  सूरज स्थित और स्थिर है। पृथ्वी एक जगह स्थित नहीं है। यह सूर्य के चारों तरफ घूम रही है। वह अपने अक्ष पर भी घूम रही है। यह सबसे पहले ऋषि आर्यभट्ट ने सारी दुनिया को बताया।

     इसके बाद इन्होंने जो सूत्र दिए। इन सूत्रों के आधार पर पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी निकाली गई। उन दूरी को आजतक दुनिया का कोई भी खगोल शास्त्री चुनौती नहीं दे पाया। इतनी ही दूरी आज के वैज्ञानिक भी पृथ्वी और सूर्य के बीच की बताते हैं। सूर्य निरापद नहीं है। इसमें बहुत सारे काले धब्बे उपस्थित हैं। यही धब्बे सूर्य के जीवन का कारण भी है। इन काले धब्बों की theory को स्टीफन हॉकिंस ने अपने नाम से लिखवाकर, world patent ले लिया। जिसे हम सभी Black Hole Theory के नाम से जानते है। 

फिर महर्षि आर्यभट्ट ने जो बात बताई। जिसे दूसरे लोग, अपने नाम से प्रकाशित करते रहे हैं। उन्होंने बताया कि हमारा सूर्य और इसके सारे ग्रह, सूर्य के प्रकाश से ही प्रकाशित है। दूसरे ग्रहों के पास, अपना कोई प्रकाश नहीं है।

 इसके बाद आर्यभट्ट ने बताया कि शनि के 5 उपग्रह हैं। इसके कुछ दिनों बाद, उन्होंने अपनी ही कही बात को संशोधित किया। फिर कहा कि शनि के 7 उपग्रह हैं। जो आज भी सार्वभौमिक सत्य है। यहां पर एक बात समझने वाली है। कि शनि के 7 उपग्रह को खोज लेना। बिना दूरबीन के कैसे संभव हुआ होगा। इसका तो सवाल ही नहीं उठता।

     इसका अर्थ बिल्कुल स्पष्ट है, कि महर्षि आर्यभट्ट ने दुनिया की सबसे पहली दूरबीन बनाई होगी। जिससे देखकर, यह बताया होगा। इसके बाद सारी दुनिया ने दूरबीन बनाना, उसकी नकल करके सीखा होगा।  महर्षि आर्यभट्ट ने बृहत संहिता और आर्यभट्ट संहिता लिखी। जिसमें हजारों सूत्र हैं। 

सूर्य के बारे में, चंद्रमा के बारे में और दूसरे ग्रहों के अंतर संबंधों के बारे में। सबसे पहले दुनिया में सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण के बारे में। ये कब होगा। कितनी देर तक रहेगा। किस वर्ष में होगा। इन सारी की सारी गणनाओ के बारे में आर्यभट्ट ने दुनिया को अवगत कराया। इसी के आधार पर पंचांग विकसित हुआ।

  आर्यभट्ट ने सूर्य और अन्य ग्रहों का अध्ययन किया। तब पाया कि पृथ्वी अपनी धुरी पर भी घूम रही और सूर्य के चारों ओर भी। तब उन्होंने बताया कि पृथ्वी के अपनी धुरी पर घूमने के आधार पर, दिन और रात होते हैं। फिर दिन और रात की अवधि की गणना के आधार पर, उन्होंने 7 दिन निर्धारित किए। सोमवार, मंगलवार, बुधवार, बृहस्पतिवार, शुक्रवार, शनिवार, रविवार।

उनके बताए, इन दिनों को आज भी सारी दुनिया में अनुसरण किया जाता है। सारे संप्रदाय के लोग, इन्हीं 7 दिनों को मानते हैं। बस अंतर इतना है कि उन्होंने इसे अपनी-अपनी भाषा में भाषांतर कर लिया है। यूनान की पूरी सभ्यता ने यही स्वीकार किया। मेसोपोटामिया की सभ्यता ने भी यही स्वीकार किया। बेबीलोनिया की सभ्यता ने भी यही स्वीकार किया।

Major Compositions of Aryabhatt
आर्यभट्ट की प्रमुख रचनाएँ

 आर्यभट्ट द्वारा रचित कार्यों की जानकारी, उनके द्वारा रचित ग्रंथों से मिलती है। इस महान गणितज्ञ ने आर्यभट्टीय, दशगीतिका, तंत्र, आर्यभट्ट सिद्धांत जैसे ग्रंथों की रचना की है।

आर्यभट्ट पहले व्यक्ति थे। जिन्होंने बीजगणित(Algebra) का प्रयोग किया था। उन्हें अपनी पुस्तक आर्यभटीय, जो कि गणित की पुस्तक थी। उसे कविता के रूप में लिखा। यह पुस्तक हमें खगोल शास्त्र और गोलीय त्रिकोणमिति के संदर्भ में जानकारी देती है। इस पुस्तक में अंकगणित (airthematic), बीजगणित (algebra), और त्रिकोणमिति (Trigonometry) के नियम बताए गए हैं।

    आर्यभटीय में कुल 108 छंद हैं। जिनको चार प्रमुख chapters में बांटा गया है। इनके हर एक छंद में बहुत गहराई छुपी हुई है। हर एक chapter में एक विशेष topic को समाहित किया गया है।

1. गीतिकपाद- इसमें 13 छंद है। इसमें समय की बड़ी इकाइयों का वर्णन किया गया। जिसे त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग में पूर्ण रूप से परिभाषित किया गया है। उन्होंने इसमें Black Hole का पूर्ण रूप से वर्णन किया है। हमारा आधुनिक विज्ञान पूरी तरह से इस पर आधारित है।

2. गणित पद- इसमें कुल 33 छंद हैं जिनमें core maths का उल्लेख किया गया है। जिसमे simple और quadratic equation, simultaneous और indeterminate equations का विस्तृत उल्लेख मिलता है। अंकगणित (Airthematic), Arithmetic Progression (AP), Geometric Progression (GP) और sum of AP, Sum of GP को समझाया गया है। इसके साथ ही वर्गमूल (Square root),घनमूल (Cube), समानांतर श्रेणी सहित कई समीकरणों को आसान भाषा में। इस ग्रंथ में समझाया गया है।

3.कालक्रिया पद- इसमें 25 छंद हैं। इसमें समय की विभिन्न इकाइयों का वर्णन किया गया है। इसके साथ ही ग्रहों की स्थित का वर्णन भी मिलता है। हमारी पृथ्वी के revolutions और rotation की उचित गणना की गई है। Eclipse के बारे में बताया गया है। इसी के आधार पर पंचांग बनाया गया। जिसका उपयोग शुभ-अशुभ कार्यों को करने ने किया जाता है।

4. गोला पद- इसमें 50 छंद है। इसमें त्रिकोणमिति (Trigonometry) और ज्यामिति (geometry) के बारे में विस्तृत उल्लेख किया गया है। पृथ्वी के आकार, दिन व रात होने कारण, आकाशीय क्षेत्र के पहलू (aspects of celestial sphere) आकाशीय भूमध्य रेखा (Celestial equator) के बारे में बताया गया है। इसमें विभिन्न राशियों (Zodiacal signs) के बारे में वर्णन मिलता है। ज्योतिष विज्ञान का भी विस्तृत वर्णन भी मिलता है।

Major Discoveries of Aryabhatt
आर्यभट्ट की प्रमुख ख़ोजे

  इतिहासकार मानते हैं कि आर्यभट्ट ने कई ग्रंथों की रचना की थी। लेकिन वर्तमान समय में, उनके केवल चार ग्रंथ ही उपलब्ध हैं। वह ग्रंथ हैं- आर्यभटीय, दशगीतिका, तंत्र और आर्यभट्ट सिद्धांत। आर्यभट्ट सिद्धांत ग्रंथ पुरा उपलब्ध नहीं है। उनके केवल 34 श्लोक ही उपलब्ध हैं। आर्यभट्ट का सबसे लोकप्रिय ग्रंथ आर्यभटीय है। जानते हैं, आर्यभट्ट के द्वारा खोजों के बारे में। जिनके बारे में, शायद ही दुनिया के अधिक लोगों को ही पता होगा।

1. आर्यभट्ट ने पृथ्वी के circumference (परिधि) की लंबाई 39968.05 km बताई। जो कि असल लंबाई 40075.01 Km से सिर्फ 0.2% ही कम है।

2. आर्यभट्ट ने वायुमंडल की ऊंचाई 80 किलोमीटर तक बताई थी। असल में वायुमंडल की ऊंचाई 1600 किलोमीटर से भी ज्यादा है। लेकिन इसका 99% हिस्सा 80 किलोमीटर की सीमा तक ही सीमित है।

3. आर्यभट्ट ने सूर्य से ग्रहों के बीच की दूरी के बारे में बताया है। यह present measurements से मिलता-जुलता है। आज पृथ्वी से सूर्य की दूरी 15 करोड़ किलोमीटर तक मानी जाती है। इसे एक AU (astronomical unit) कहा जाता है। आर्यभट्ट के measurements और वर्तमान measurements इस तरह से हैं-

आर्यभट्ट व आधुनिक विज्ञान के अनुसार

 सूर्य से ग्रहों के बीच की दूरी

ग्रह

Planets

आर्यभट्ट गणना

दूरी 

(AU में)

आधुनिक गणना

 दूरी 

(AU में)

Mercury

0.375 AU

0.387 AU

Venus

0.725 AU

0.723 AU

Mars 

1.538 AU

1.523 AU

Jupiter

4.16 AU

4.20 AU

Saturn

9.41 AU

9.54 AU

4. आर्यभट्ट ने तारों की मदद से, पृथ्वी के घूमने की गति को माप कर बताया था। कि एक दिन की लंबाई 23 hour 56 minutes 4.1 second है। जो कि असल से सिर्फ 0.86 second कम है। आर्यभट्ट से पहले कई ग्रीक, यूनानी और भारतीय वैज्ञानिकों ने 1 दिन की लंबाई बताई थी। लेकिन वह आर्यभट्ट जितनी सटीक यानी कि accurate एक्यूरेट नहीं थी।

5. आर्यभट्ट के अनुसार, एक साल की लंबाई लगभग 365.25868 दिन है, जो कि आधुनिक गणना 365.25636 दिन के लगभग बराबर है।

6. चांद के पृथ्वी के इर्द-गिर्द चक्कर लगाने को, आर्यभट्ट ने 27.32167 दिन के बराबर बताया था। जो कि आधुनिक गणना 27.32167 दिन के लगभग बराबर है।

7. आर्यभट्ट ने केवल यही नहीं बताया कि सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण क्यों लगते हैं। बल्कि ग्रहण लगने का समय निकालने का formula भी बताया था। उन्होंने ग्रहण कितनी देर तक रहेगा। इस बात का पता लगाने का formula भी दिया था।

8. आर्यभट्ट ने पाई (π) की value दशमलव के चार अंक तक बताई थी। जो कि π = 3.1416 है।

9. आर्यभट्ट ने त्रिकोणमिति यानी Trigonometry के sin और cosin की खोज की थी। आर्यभट्ट ने इन्हें ज्या और कोज्या कहा है। इसका मतलब पूरी दुनिया में, जो Trigonometry पढ़ाई जाती है। वह वास्तव में, आर्यभट्ट की ही खोज थी।

10. आर्यभट्ट ने ब्रह्मांड यानी universe को अनादि अनंत माना। भारतीय दर्शन के अनुसार अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी और आकाश। इन पांच तत्वों से इस सृष्टि का सृजन या निर्माण हुआ है। लेकिन आर्यभट्ट ने आकाश को तत्व नहीं माना।

11. आर्यभट्ट ने उस समय की प्रचलित अवधारणा को रद्द कर दिया कि पृथ्वी इस ब्रह्मांड के केंद्र यानी कि center में है। आर्यभट्ट के अनुसार, सूर्य सौरमंडल यानी solar system के center में स्थित है। पृथ्वी सहित बाकी ग्रह, इसकी परिक्रमा करते हैं।

12. आपने अक्सर सुना होगा कि आर्यभट्ट ने जीरो की खोज की थी। तो आपकी यह जानकारी गलत है। दरअसल उन्होंने गणनाओं को विशेष चिन्ह, द्वारा लिखने की शुरुआत की थी।

आर्यभट्ट का निधन

  आर्यभट्ट का निधन दिसम्बर 550 ईसवी में हुआ था। उस वक्त, उनकी आयु 74 वर्ष के लगभग थी। लेकिन उनके जीवन के अंतिम अवधि और ठिकाने की सटीक जानकारी, आज भी संदिग्ध है।

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